हाइलाइट्स

  • गांधी के ऐतराज पर ही कांग्रेस छोड़ गए थे नेताजी
  • गांधी के तरीके से सहमत नहीं थे सुभाष चंद्र बोस
  • मतभेद थे पर दोनों एक-दूसरे का सम्मान करते थे

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1939 में कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए हुए चुनाव में सुभाष चंद्र बोस ने जीत हासिल की लेकिन गांधी जी की वजह से उन्हें पीछे हटना पड़ा, जानें क्या थी वजह इस आर्टिकल में...

वो तारीख थी 29 जनवरी 1939...कड़ाके की ठंड थी लेकिन देश की सियासत गर्म थी क्योंकि कांग्रेस के नए अध्यक्ष के लिए हुए चुनाव का परिणाम आने वाला था और जब नतीजे आए तो हलचल मच गई. इस चुनाव में सुभाष बाबू (Subhash Chandra Bose) को 1580 और पट्टाभि सीतारमैय्या को 1377 वोट मिले. महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) ने कहा- ये मेरी हार है क्योंकि पट्टाभि (Pattabhi Sitaramayya) को मैंने खड़ा किया था...गांधी का इशारा मिला तो पटेल और नेहरू समेत वर्किंग कमेटी के 13 सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया और जीत के बावजूद सुभाष चंद्र बोस को पीछे हटना पड़ा.

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नतीजा ये हुआ कि सुभाष ने नई पार्टी बनाई- फॉर्रवर्ड ब्लॉक (All India Forward Bloc). अब तक की कहानी से आप समझ गए होंगे कि दोनों ही दिग्गजों में गहरे मतभेद पैदा हो चुके थे. लेकिन वही सुभाष बाद में सिंगापुर रेडियो से देश को संबोधित करते हैं तो कहते हैं- राष्ट्रपिता, हिंदुस्तान की आजादी की लड़ाई में हम आपका आशीर्वाद मांगते हैं. तब गांधी को पहली बार किसी ने राष्ट्रपिता कहा था और आज की तारीख का संबंध इसी घटना से है...सुभाष यानी नेताजी ने जब ये ऐतिहासिक संबोधन किया था तब ताऱीख थी 6 जुलाई, 1944.

कब हुई थी महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस की मुलाकात?

दरअसल, महात्मा गांधी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बीच पहली मुलाकात साल 1921 में हुई थी. सुभाष, गांधी से प्रभावित थे और उन्हीं के कहने पर कांग्रेस में काम शुरू किया था. सुभाष यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष भी चुने गए. लेकिन परेशानी ये थे कि बोस कांग्रेस में गरम दल समझे जाने वाले बाल गंगाधर तिलक (Bal Gangadhar Tilak) के समर्थक थे जबकि गांधी नरम दल समझे जाने वाले गोपाल कृष्ण गोखले (Gopal Krishna Gokhale) के समर्थक थे. कहा जाता है कि गांधी और सुभाष में शुरुआती मतभेद यहीं से शुरू हुए. बाद में 1927 में सुभाष ने पूर्ण स्वराज का नारा दिया...जिसे गांधी ने खुले तौर पर नकार दिया. यह पहला मौका था जब गांधी जी और उनके बीच के खराब संबंध सामने आए. इसके बाद साल 1931 में भगत सिंह की फांसी के मसले पर भी नेताजी ने गांधीजी से कहा था कि वे इसे हर हाल में रुकवाएं लेकिन ऐसा हो न सका. दोनों के बीच मतभेद और बढ़ गए.

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ये मतभेद 1939 आते-आते और भी गहरे हो गए. त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन से ठीक पहले सुभाष ने दोबारा कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए खड़ा होने का फैसला किया. गांधी सुभाष को लगातार दूसरा कार्यकाल दिए जाने के खिलाफ थे. उनका मानना था कि इससे गलत परंपरा कायम होगी. गांधी जी ने सरदार पटेल के जरिये सुभाष बाबू के भाई शरत चंद्र बोस (Sarat Chandra Bose) को तार भिजवाया. उनसे आग्रह किया कि वह सुभाष बाबू को चुनाव न लड़ने के लिए राजी करें. लेकिन सुभाष बाबू अडिग रहे. 21 जनवरी, 1939 को उन्होंने अध्यक्ष पद की दावेदारी पेश करते हुए कहा-विनम्रता का झूठा दिखावा छोड़ा जाए, क्योंकि इसमें निजी जैसा कुछ भी नहीं. यदि वह चुनाव से हटेंगे तो उन्हें महसूस होगा कि वह जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश कर रहे हैं.

सुभाष चंद्र बोस ने पट्टाभि को दी शिकस्त

नतीजा ये हुआ कि चुनाव हुए और गांधी के उम्मीदवार पट्टाभि के मुकाबले सुभाष ने शानदार जीत दर्ज की. बाद में गांधीजी ने कांग्रेस के कार्यकर्ताओं से कहा कि वह यदि बोस के काम से खुश नहीं हैं तो कांग्रेस छोड़ सकते हैं. गांधी जी की इस अपील के बाद कांग्रेस कार्यकारिणी के 14 सदस्यों में से 12 ने इस्तीफा दे दिया. आखिर में सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस से अलग हो गए.

यहां तक की कहानी सुन कर ऐसा लग सकता है कि गांधी और सुभाष की राहें न सिर्फ जुदा थीं बल्कि दोनों एक-दूसरे को नापसंद भी करते थे...देश में वर्तमान राजनीतिक हालात को देखकर आप अगर ऐसा सोचें तो गलत भी नहीं होगा...लेकिन जनाब वो दौर कुछ और ही था.

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उसी त्रिपुरी अधिवेशन में अपनी हार के बाद बावजूद गांधी ने यंग इंडिया (Young India Newspaper) में छपे लेख में लिखा- सुभाष बाबू लोगों की कृपा के सहारे अध्यक्ष नहीं बने हैं बल्कि चुनाव में जीतकर अध्यक्ष बने हैं. सुभाष बाबू देश के दुश्मन तो हैं नहीं. उन्होंने उसके लिए कष्ट सहन किए हैं. मैं उनकी जीत से खुश हूं.

उसी के अगले साल यानी साल 1940 में जब सुभाष बाबू को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया तो गांधी ने कहा था- सुभाष बाबू जैसे महान व्यक्ति की गिरफ्तारी मामूली बात नहीं है. लेकिन सुभाष बाबू ने अपनी लड़ाई की योजना बहुत समझ-बूझ और हिम्मत से बनाई है. वह मानते हैं कि उनका तरीका सबसे अच्छा है. उन्होंने मुझसे बड़ी आत्मीयता से कहा कि जो कुछ कार्य समिति नहीं कर पायी, उसे कर दिखाएंगे. वह विलम्ब से ऊब चुके हैं. मैंने उनसे कहा कि आपकी योजना के फलस्वरुप मेरे जीवनकाल में स्वराज मिल गया तो बधाई का पहला तार मेरी ओर से आपको मिलेगा.

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दरअसल तब की सियासत नेताओं के निजी संबंधों में जहर नहीं घोला करती थी. यही वजह है कि जब नेताजी ने आजाद हिंद सरकार की घोषणा की तो उन्होंने सिंगापुर रेडियो से रूंधे हुए गले से कहा- राष्ट्रपिता इस लड़ाई में हमें आपका आर्शीवाद चाहिए. बाद में बापू की हत्या के बाद जब नेहरू ने देश के नाम संबोधन जारी किया तो उन्होंने भी कहा- देश ने राष्ट्रपिता को खो दिया.

चलते-चलते आज की दूसरी घटनाओं पर भी एक नजर डाल लेते हैं

2005 - मैक्सिको में मानव का चालीस हज़ार वर्ष पुराना पदचिह्न मिला...

2006 - विश्व कप फ़ुटबाल में फ्रांस ने पुर्तगाल को हराया...

1935 - बौद्ध धर्मगुरू दलाई लामा का जन्म

1901 - श्यामाप्रसाद मुखर्जी का जन्म

2002 - भारत के मशहूर उद्योगपति धीरूभाई अंबानी का निधन

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