हाइलाइट्स

  • 21 जून 1991 को ही नरसिम्हा राव ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी
  • 1991 लोकसभा चुनाव से पहले राव राजनीति छोड़ने का मन बना चुके थे
  • नरसिम्हा राव ने देश की दशा और दिशा बदल डाली

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21 जून 2022 को झरोखा के खास शो में जानते हैं भारत के पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के बारे में... कैसे राव ने भारत को आर्थिक आजादी दिलाई, आप भी जानिए

आज का इतिहास, 21 जून : वो तारीख थी- 25 दिसंबर 2004. दिल्ली के 9 मोती लाल नेहरू मार्ग पर तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ( Atal Bihari Vajpayee ) पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ( Former Prime Minister Narasimha Rao ) को श्रद्धांजलि देने पहुंचे थे. स्वर्गीय राव के पार्थिव शरीर को नमन करने के बाद वाजपेयी ने पत्रकारों के सामने खुलासा किया- मई 1996 में जब मैंने राव के बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली, तो उन्होंने मुझे बताया था कि बम तैयार है. मैंने तो सिर्फ विस्फोट किया है.

शेखर गुप्ता के सवाल का जवाब

एक और किस्सा मशहूर है- पत्रकार शेखर गुप्ता ने राव से पूछा था- आप परमाणु परीक्षण क्यों नहीं कर पाए तो राव ने अपने पेट पर थपकी मारते हुए कहा- अरे भाई, कुछ राज़ मेरी चिता के साथ भी तो चले जाने दो...आज की तारीख का संबंध उन्हीं नरसिम्हा राव से है जिन्होंने उस नए भारत का निर्माण किया जिनमें आज आप और हम जी रहे हैं....21 जून 1991 को ही नरसिम्हा राव ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी. देश दुनिया के ऐतिहासिक घटनाक्रमों में पर आधारित शो झरोखा में आज इसी पर बात होगी.

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नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह ने बदली देश की तकदीर

वो 1991 का साल था...भारत को दो ऐसे नेता मिले जिन्होंने हमेशा के लिए मुल्क की किस्मत बदल दी...एक थे नरसिम्हा राव और दूसरे थे मनमोहन सिंह ( Manmohan Singh ) ...एक प्रधानमंत्री और दूसरे वित्तमंत्री. दिलचस्प ये है कि दोनों ही इस पद के लिए पहली पसंद नहीं थे. राजीव गांधी की असामयिक मौत के बाद सोनिया गांधी शंकर दयाल शर्मा को PM बनाना चाहती थीं लेकिन उन्होंने मना कर दिया तब नरसिम्हा राव का नंबर लगा...उसी तरह खुद नरसिम्हा राव अपने वित्त मंत्री की कुर्सी पहले पीसी अलेक्जेंडर ( P. C. Alexander ) को देना चाहते थे लेकिन उनके मना करने पर मनमोहन को मौका मिल गया...इसके बाद इस जोड़ी ने जो किया वो इतिहास है.

नरसिम्हा राव रिटायर होने का मन बना चुके थे

दिलचस्प ये है कि 1991 लोकसभा चुनाव से पहले नरसिम्हा राव ने राजनीति छोड़ने का मन बना लिया था. यहां तक की उन्होंने दिल्ली स्थित अपने घर का सामान वापस भेजना शुरू कर दिया था. उन्होंने इंडिया इंटरनेशनल संस्था ( india international organization ) की सदस्यता भी ले ली थी ताकि रिटायरमेंट के बाद कभी दिल्ली आना हो तो ठहरने का इंतजाम हो सके. लेकिन भविष्य ने उनके लिए कुछ और लिख रखा था. सोनिया गांधी ने उन्हें प्रधानमंत्री बनने का ऑफर दिया. दबी जुबान में कई जानकार कहते हैं कि तब सोनिया को लगा था कि नरसिम्हा राव रबर स्टैम्प साबित होंगे...लेकिन राव ने न सिर्फ वापसी की बल्कि नया इतिहास भी रच दिया.

'प्राइम मिनिस्टर ऑफ इंडिया माइंड्स'

मशहूर राजनीतिक विश्लेषक संजय बारू ( Political Analyst Sanjaya Baru ) अपनी किताब में एक किस्से का जिक्र करते हैं. जब एक बार राव ने सोनिया गांधी के यहां फोन किया तो उन्हें पांच मिनट इंतजार करना पड़ा...तो सोनिया के सेक्रेटरी से उन्होंने कहा- आई डॉन्ट माइंड बट प्राइम मिनिस्टर ऑफ इंडिया माइंड्स. बहरहाल नरसिम्हा राव टॉप स्पीड में अपने काम में जुट गए. अपने प्रधानमंत्री काल के पहले ही साल में यानी 1991 में भारतीय अर्थव्यवस्था की सूरत ही बदल दी. देश समाजवादी अर्थव्यवस्था से लिब्रलजाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन और ग्लोबलाइजेशन यानि उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की ओर बढ़ गया. कहा जाता है कि 1947 में देश को आजादी भले ही मिली हो लेकिन आर्थिक आजादी 1991 में ही मिली. जब नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह ने दुनिया के लिए भारत के दरवाजे खोल दिए और लाइसेंस-परमिट राज को खत्म कर दिया.

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1991- हाउ पीवी नरसिम्हा राव मेड हिस्ट्री

संजय बारू अपनी किताब '1991- हाउ पीवी नरसिम्हा राव मेड हिस्ट्री' ( 1991: How P.V. Narasimha Rao Made History ) में लिखते हैं कि कॉमर्स एंड इंडस्ट्री मिनिस्ट्री राव के पास थी. लेकिन उन्होंने विपक्ष के विरोध से बचने का तरीका निकाल लिया. पीजे कुरियन को इस मिनिस्ट्री का जूनियर मंत्री बनाया गया. जब मनमोहन सिंह बजट भाषण पढ़ने वाले थे उसके कुछ घंटे पहले ही कुरियन ने लाइसेंस-परमिट राज को खत्म करने का ऐलान कर दिया. लगभग एक पखवाड़ा बाद लोगों की और मीडिया की नजर इस पर गई. लेकिन तब तक सारा काम हो चुका था और नरसिम्हा राव ने बाजी मार ली थी.

5 साल चली नरसिम्हा राव सरकार

नेहरू-गांधी परिवार के अलावा पूरे पांच साल सरकार चलाने वाले नरसिम्हा राव देश के पहले प्रधानमंत्री थे लेकिन उनका सफर आसान नहीं था. वे जब देश में आर्थिक सुधार के लिए मनमोहन सिंह की हौसला अफजाई कर रहे थे तब वह विपक्ष के निशाने पर भी थे. विपक्षी नेता मनमोहन सिंह के बहाने राव पर हमला करते थे और सिंह इसे समझ नहीं पाते थे और बार बार इस्तीफा देने के लिए पीएम राव के पास पहुंच जाते थे. कहा जाता है कि मनमोहन सिंह ने तीन बार इस्तीफे की पेशकश की लेकिन हर बार राव ने उन्हें समझा कर मना लिया और कहा कि आप काम करिए जो राजनीतिक हमला झेलना है उसके लिए मुझे छोड़ दीजिए.

राव कई भाषाओं के जानकार थे

तमाम आरोप प्रत्यारोप लगते रहे लेकिन नरसिम्हा राव ने देश की दशा और दिशा बदलने में लगे रहे. कई भारतीय भाषाओं के जानकार होने के साथ-साथ वे अरबी, पार्सियन, स्पेनिश, फ्रेंच, जर्मन में भी पारंगत थे. खुद वाजपेयी राव को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे. उन्होंने इस बात को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार भी किया था. दरअसल राव ने साहस के साथ चुनौती का सामना किया और उसे अवसर में बदल दिया.

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चलते-चलते आज की तारीख में घटी दूसरी बड़ी घटनाओं पर भी निगाह डाल लेते हैं.

1933- भारत के प्रसिद्ध लेखक, उपन्यासकार और नाटककार मुद्राराक्षस ( Mudrarakshasa ) का जन्म

1948- सी. राजगोपालाचारी ( C. Rajagopalachari ) भारत के गवर्नर जनरल बने. वह देश के अंतिम गवर्नर जनरल थे

2009- साइना नेहवाल ( Saina Nehwal ) सुपर सीरीज बैडमिंटन टूर्नामेंट का खिताब

2015- यूएन की मंजूरी के बाद पहला अंतरराष्ट्रीय योग दिवस ( International Day of Yoga ) मनाया गया.

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