कभी 'लेफ्ट' यानी वामपंथियों के करीबी रहे मिथुन चक्रवर्ती ने अपने जीवन में अभी तक टीएमसी से होते हुए बीजेपी तक का राजनीतिक सफर तक किया है. वो राजनीति के लिए कही जाने वाली उस बात को चरितार्थ करते हैं कि इसमें दोस्ती-दुश्मनी कुछ भी स्थायी नहीं. हालांकि, ये भी हकीकत है कि रील लाइफ में अपनी फिल्मों से छाप छोड़ने वाले मिथुन को रीयल लाइफ़ की राजनीति कभी रास नहीं आई.
उनकी नई पारी को लेकर एक सवाल ये भी उठ रहा है कि तकरीबन पांच सालों से राजनीति से दूर रहे मिथुन ने दोबारा राजनीति में आने और पाला बदलने का फैसला क्यों किया? वहीं, सवाल ये भी है कि टीएमसी की राज्यसभा सदस्यता बीच में ही छोड़ने वाले मिथुन क्या प्रशंसकों की भीड़ को बीजेपी के वोट बैंक में तब्दील कर पाएंगे?
बता दें कि बंगाल में लेफ्ट फ्रंट की सरकार के दौर में मिथुन की गिनती सीपीएम के करीबी लोगों में होती थी. मिथुन कई बार खुद को वामपंथी बता चुके हैं. हालांकि, बाद में उन्होंने मुर्शिदाबाद जिले के जंगीपुर लोकसभा क्षेत्र में तब के विदेश मंत्री और कांग्रेस के दिग्गज नेता प्रणब मुखर्जी के लिए भी प्रचार किया था.
इन सबके बीच साल 2011 में लेफ्ट का शासन खत्म होने के बाद वे धीर-धीरे सीएम ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के करीब आए. बनर्जी ने उनको राज्यसभा में पहुंचाया. अपने कार्यकाल के दौरान संसद में उनकी उपस्थिति बहुत कम रही. क़रीब तीन साल तक राज्यसभा का सदस्य रहने के दौरान वे महज तीन बार ही संसद में गए थे.
इसके कुछ समय बाद ही शारदा चिटफंड घोटाले में नाम आने की वजह से वो परेशान हो गए. फिर साल 2016 के आखिर में मिथुन ने राज्यसभा से इस्तीफा दे कर राजनीति से संन्यास ले लिया. तब इस्तीफे को मिथुन के खराब स्वास्थ्य से जोड़ा गया. हालांकि, इसकी असल वजह शारदा चिटफंड घोटाले को ही माना गया. मामले में ईडी ने उनसे पूछताछ भी की थी. इसके कुछ दिनों बाद मिथुन ने ब्रांड एंबेसडर के तौर पर कंपनी से लिए गए 1 करोड़ 20 लाख रुपये की रकम ये कहकर लौटा दी कि वो किसी के पैसे नहीं हड़पना चाहते.
ऐसे झटके के बाद मिथुन ने राजनीति से तो संन्यास लिया ही, वो सार्वजनिक तौर पर भी कम नज़र आने लगे. इन सबके बीच 2019 में मिथुन को विवेक अग्निहोत्री की फिल्म 'ताशकंद फाइल्स' में देखा गया. अग्निहोत्री की ही अगली फिल्म 'द कश्मीर फाइल्स' में भी मिथुन अहम भूमिका में नजर आएंगे. इस दौरान उनकी एक ऐसे शख़्स से मुलाकात हुई जिसकी वजह से उनके एक्टिव पॉलिटिक्स में आने की अटकलें लगाई जाने लगीं. जब उन्होंने मुंबई में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत से मुलाकात की तो बातें होने लगी की वो बीजेपी में जाने वाले हैं.
हालांकि, तब मिथुन ने इसे आध्यात्मिक मुलाकात करार देते हुए राजनीति में लौटने की अटकलों को निराधार बताया जिसके बाद पीएम नरेंद्र मोदी की कोलकाता के ब्रिगेड मैदान की पिछली रैली में उन्होंने बीजेपी का दामन थाम लिया. विधानसभा चुनावों में उनके इस कदम को उनकी पूर्व पार्टी यानी टीएमसी के लिए बड़ी चुनौती बताया जा रहा है.
हालांकि ऐसे बयानों के बीच सवाल ये भी है कि सिनेमा में तो अपनी दूसरी पारी में मिथुन पहले से ज्यादा कामयाब रहे हैं. लेकिन क्या मंझधार में संन्यास लेने वाले मिथुन की राजनीति में वापसी भी उतनी ही कामयाब रहेगी?