नाम: फादर स्टैन स्वामी
उम्र: 84 साल
गिरफ्तारी: 8 अक्टूबर 2020
आरोप: भीमा कोरेगांव केस में हिंसा भड़काने की साजिश में शामिल
केस: UAPA के तहत केस दर्ज
देश के सबसे बुजुर्ग शख्स जिनपर आतंकी धाराओं के तहत दर्ज हुआ केस
बीमारी: पार्किन्संस, सुनाई नहीं देना, लंबर स्पॉन्डिलाइसिस और कोविड-19
इनसे जुड़ा एक मामला काफी सुर्खियों में रहा था. बात 26 नवंबर 2020 की है. पार्किन्संस से पीड़ित बुजुर्ग स्वामी जेल प्रशासन और NIA से लगातार उन्हें सिपर और स्ट्रॉ देने की मांग कर रहे थे, क्योंकि पार्किन्संस के चलते वो गिलास नहीं पकड़ पाते थे. स्वामी ने कहा था कि गिरफ्तारी के समय NIA ने उनका सिपर ले लिया था वही वापस कर दे. लेकिन NIA ने मुंबई की स्पेशल कोर्ट में इसपर जो बयान दिया था उसने सबको हैरान किया. NIA ने कहा कि वो 83 साल के स्टैन स्वामी को सिपर और स्ट्रॉ नहीं दे सकती, क्योंकि वो उसके पास नहीं है. स्पेशल कोर्ट ने भी NIA का जवाब सुनने के बाद बुजुर्ग स्वामी की पानी पीने के लिए सिपर की मांग खारिज कर दी थी. फिर जब उनके वकील ने उनकी बीमारी और मजबूरी का हवाला देकर नई अर्जी के साथ पानी पीने के लिए सिपर यानि बोतल मांगी तो स्पेशल कोर्ट ने जेल प्रशासन से इसपर सवाल करते हुए मामले को दो हफ्ते के लिए टाल दिया.
अब बुजुर्ग स्टैन स्वामी नहीं रहे. बीमारी में बेल का इंतजार करते करते, अदालत से गुहार लगाते लगाते 84 साल के स्वामी जिंदगी से हमेशा के लिए रिहा हो गए.
बाइट- कोई आई हो तो
वीओ-
हालांकि उनका जीवन संघर्षों की एक लंबी दास्तान रहा है. स्टैन स्वामी 60 के दशक में तमिलनाडु के त्रिचि से झारखंड पादरी बनने आए थे. उनके पिता किसान थे और स्टेन की शुरूआती शिक्षा और कॉलेज की पढ़ाई भी त्रिचि में ही हुई थी. थियोलॉजी की शिक्षा पूरी करने के बाद वो पादरी बने, लेकिन मन आदिवासियों की सेवा में लगा था. उनके करीबी बताते हैं कि
- वो कहते थे कि ईश्वर के लिए काम करनेवाले लोग बहुत हैं, मैं तो लोगों के लिए काम करूंगा
70 के दशक से ही फादर स्टैन स्वामी झारखंड में आदिवासियों के हक की लड़ाई लड़ते रहे, उनकी मदद करते रहे, उनकी आवाज बनते रहे.
फादर स्वामी ने फिलीपींस की यूनिवर्सिटी से ग्रैजुएशन किया था, जिसके बाद उन्होंने यूरोप में भी उच्च शिक्षा हासिल की. उस वक्त मनीला में वहां के तानाशाह के खिलाफ चल रहे आंदोलन को उन्होंने करीब से देखा था. कहते हैं उस आंदोलन ने उनके मन में गहरा प्रभाव डाला.
आदिवासियों की मदद के लिए साल 2006 में उन्होंने 'बगईचा' नाम की संस्था की नींव रखी. चर्च के सहयोग से बना ये संस्थान लंबे समय तक उनका ठिकाना और संघर्ष का केंद्र रहा.
- यहां वो मानवाधिकार, संघर्ष और समन्वय जैसे मूल्यों के साथ संघर्षरत रहे
- इसके जरिए गरीबों से जुड़ी सरकारी योजनाओं, मनरेगा और सामाजिक सुरक्षा जैसी योजनाओं के बारे में वो लोगों को प्रशिक्षित करते रहे
- पीड़ितों और शोषितों की मदद, फैक्ट फाइंडिंग टीम बनाकर मानवाधिकार आयोग से भी ऐसे लोगों के लिए वो मदद लेते थे
- इस तरह के मामलों में जेल में बंद तकरीबन 4 हजार बंदियों के लिए वे न्याय की लड़ाई लड़ रहे थे
-कोरोना के दौरान भी उनकी संस्था बगईचा ने प्रवासी मज़दूरों के लिए सहायता केंद्र शुरू किया था
- स्टेन ने करीब 5 दशकों तक झारखंड के आदिवासी और मूलवासियों के अधिकारों के लिए काम किया
-बीजेपी की अगुवाई वाली राज्य सरकार के CNT, SPT कानूनों में संशोधन और लैंड बैंक नीति का उन्होंने जमकर विरोध किया
- उनकी लोकप्रियता का आलम ये था कि ना सिर्फ झारखंड के आदिवासी तबके बल्कि देश और विदेश से जुड़े मानवाधिकार संगठनों ने भी उनकी गिरफ्तारी का जमकर विरोध किया
राष्ट्रीय जांच एजेंसी NIA ने उन्हें 8 अक्टूबर 2020 को रांची में उनके घर से गिरफ्तार किया. NIA ने भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में ये गिरफ्तारी की और उन पर UAPA की धाराएं लगाई गईं. हालांकि गिरफ्तारी से दो दिन पहले ही स्टैन स्वामी ने एक वीडियो के जरिए अपना पक्ष रखा था.
बाइट- फादर स्टैन स्वामी ( मैं स्टेन स्वामी हूं. NIA मेरे पीछे लगी है. सरकार मुझे रास्ते से हटाने की कोशिश कर रही है. उसका पहला मौका था भीमा-कोरेगांव, जबकि मैं कभी भीमा-कोरेगांव गया भी नहीं. लेकिन मुझे संदिग्धों की लिस्ट में डाल दिया गया.दो बार रेड की गई. NIA ने मुझसे 15 घंटे पूछताछ की. मेरे सामने ऐसे कई दस्तावेज रखे, जो कथित तौर पर मेरा संबंध माओवादियों से दिखाते हैं. उन लोगों ने दावा किया कि ये दस्तावेज और जानकारियां मेरे कंप्यूटर से मिली हैं. तब मैंने उन्हें कहा कि यह साजिश है. ऐसे दस्तावेज चोरी से मेरे कंप्यूटर में डाले गए हैं)
अब फादर स्टैन स्वामी नहीं रहे, लेकिन अपने पीछे वो कई सवाल छोड़ गए हैं. मानवाधिकार, अभिव्यक्ति की आजादी, सरकार का रूख और न्यायपालिका का रवैया. एक समाज के तौर पर इन सवालों के जवाब तलाशना आसान नहीं होगा.