हाइलाइट्स

  • केंद्र सरकार ने सरकारी नौकरियों के आंकड़ें पेश किए
  • 8 वर्षों में करीब 22.5 करोड़ युवाओं ने किया आवेदन
  • सिर्फ 7.22 लाख युवाओं को मिली सरकारी नौकरी
  • अलग-अलग विभागों में करीब 10 लाख पद खाली

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लोकसभा (Lok Sabha) में सरकार की ओर से पेश किए गए आंकड़ें इस बात की गवाही दे रहे हैं कि देश में बेरोजगारी अपने चरम पर है. बीते 8 साल के दौरान करीब 22 करोड़ युवाओं ने सरकारी नौकरी के लिए आवेदन किया था. लेकिन इनमें से सिर्फ 7.22 लाख को नौकरी मिली. 

देश में बेरोजगारी (Unemployment) किस कदर बढ़ी हुई है. इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बीते 8 सालों में जितने लोगों ने सरकारी नौकरी (Government Job) के लिए आवेदन किया था. उसमें से सिर्फ 0.3 फीसदी लोगों को ही सरकार रोजगार दिलाने में सफल रही है. ये हम नहीं कह रहे, बल्कि ये आंकड़े खुद सरकार के हैं.

कार्मिक राज्यमंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह (Minister of State for Personnel Dr. Jitendra Singh) ने लोकसभा (Lok Sabha) में जानकारी दी कि पिछले 8 सालों के दौरान करीब 22.5 करोड़ युवाओं ने सरकारी नौकरी के लिए आवेदन किया था. जिसमें से करीब 7.22 लाख को ही सरकारी नौकरी मिल पाई. जो एक फीसदी से भी कम है. ये चौंकाने वाले आंकड़े 2014-15 से लेकर 2021-22 तक के हैं. यानी नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) के प्रधानमंत्री (Prime Minister) बनने के बाद 8 सालों के दौरान सिर्फ 7.22 लाख युवाओं को ही नौकरी मिली. जबकि 2014 में सत्ता संभालते वक्त नरेंद्र मोदी ने हर साल 2 करोड़ युवाओं को नौकरी देने का वादा किया था.

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इस हिसाब से सरकार को अब तक 16 करोड़ नौकरियां दे देनी चाहिए थी. लेकिन बीते आठ सालों के दौरान औसतन हर साल एक लाख युवाओं को सरकारी नौकरी देने में भी नाकाम रही है. इन 8 सालों के दौरान सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करने वालों की संख्या ये बताने के लिए काफी है कि देश में बेरोजगारी किस तरह अपने चरम पर है. वैसे इन 8 सालों के दौरान सरकार ने स्वरोजगार (Self Employment) पैदा करने के नाम पर कई योजनाओं की शुरुआत की. लेकिन इसका कोई खास असर दिखाई नहीं दे रहा है.

रोजगार को लेकर सरकार के तमाम उपाय नाकाफी साबित हो रहे हैं. इन सबके बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने हाल ही में अगले डेढ़ साल में 10 लाख नौकरियां देने का ऐलान किया है. लेकिन ये वादा पूरा होगा कैसे, क्योंकि कोविड महामारी (Covid Pandemic) के चलते लड़खड़ाई अर्थव्यवस्था (Economy) अब तक पटरी पर नहीं लौट पाई है. जून 2022 में बेरोजगारी दर 7.80% पर पहुंच गई. अंतरराष्‍ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund) ने भी वैश्विक मंदी (Global Recession) को लेकर चेतावनी दी है. ऐसे में आंकड़ों के जरिए हम यह समझने की कोशिश करते हैं कि कैसे देश में सरकारी नौकरियां खत्म होती जा रही हैं.

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रोजगार पर क्या कहते हैं सरकारी आकड़ें?

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक बीते 8 वर्षों के दौरान करीब 22.5 करोड़ युवाओं ने सरकारी नौकरी के लिए आवेदन किया था. यानी 2014-15 में 2 करोड़ 32 लाख 22 हजार 83, 2015-16 में 2 करोड़ 95 लाख 51 हजार 844, 2016-17 में 2 करोड़ 28 लाख 99 हजार 612, 2017-18 में 3 करोड़ 94 लाख 76 हजार 878, 2018-19 में 5 करोड़ 9 लाख 36 हजार 479, 2019-20 में 1 करोड़ 78 लाख 39 हजार 752, 2020-21 में 1 करोड़ 80 लाख 1 हजार 469 और 2021-22 में 1 करोड़ 86 लाख 71 हजार 121 आवेदन मिले. जिसमें से करीब 7.22 लाख को ही सरकारी नौकरी मिल पाई. 2014-15 में 1 लाख 30 हजार 423, 2015-16 में 1 लाख 11 हजार 807, 2016-17 में 1 लाख 1 हजार 333, 2017-18 में 76 हजार 147, 2018-19 में 38 हजार 100, 2019-20 में 1 लाख 47 हजार 96, 2020-21 में 78 हजार 555 और 2021-22 में 38 हजार 850 उम्मीदवारों को नौकरी मिली.

किस विभाग में कितने पद खाली ?

केंद्र सरकार ने लोकसभा में बताया कि एक मार्च 2021 की स्थिति के मुताबिक केंद्र सरकार के अलग-अलग विभागों में कुल स्वीकृत पदों की संख्या करीब 40.35 लाख है. में करीब 9.79 लाख पद खाली हैं. संसद में पेश किए गए सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस वक्त गृहमंत्रालय (Home Ministry) में करीब 1.4 लाख पद खाली हैं. इसी तरह रेल मंत्रालय (Ministry of Railway) में करीब 2.94 लाख, रक्षा (नागरिक) विभाग में 2.64 लाख, डाक विभाग (Postal Department) में 90 हजार, और राजस्व विभाग (Reveneue Department) में करीब 80 हजार पद खाली हैं. कोरोना माहामारी के चलते सेना ने 2020-21 और 2021-22 में भर्ती प्रक्रिया को स्थगित कर दिया था. केंद्र सरकार की ओर से हाल ही में अग्निवीर योजना की घोषणा की है. जिसके लिए भर्ती प्रक्रिया शुरू की गई है.

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भारतीय राज्यों में बेरोजगारी दर

सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी (Center for Monitoring Indian Economy) की ओर से अप्रैल महीने में जारी मासिक आंकड़ों की मानें तो हरियाणा में सबसे ज्यादा 26.7% बेरोजगारी दर है. जबकि राजस्थान और जम्मू-कश्मीर में यह 25-25% है. बिहार में 14.4%, त्रिपुरा में 14.1%, पश्चिम बंगाल में 5.6% है. आंकड़ों के मुताबिक कर्नाटक और गुजरात में सबसे कम 1.8% बेरोजगारी दर है. CMIE के आंकड़ों के मुताबिक जून 2022 में पूरे देश के लेवल पर बेरोजगारी दर 7.80% थी. बेरोजगारी का यह आंकड़ा शहरी क्षेत्र में 7.30 और ग्रामीण क्षेत्र में 8.03% रहा. जून महीने में ही कृषि क्षेत्र में सबसे ज्यादा करीब 1.3 करोड़ लोगों को रोजगार से हाथ धोना पड़ा. सरकार के आंकड़ों के मुताबिक देश में 2020 में महामारी की पहली लहर में 1.45 करोड़, दूसरी लहर में 52 लाख, और तीसरी लहर में 18 लाख लोगों की नौकरी गई.

सरकार ने शुरू की कई योजनाएं

हालांकि सरकार ने रोजगार सृजन के साथ रोजगार क्षमता में सुधार के लिए कई कदम उठाए हैं. व्यापार को प्रोत्साहित करने और कोरोना महामारी के प्रतिकूल असर को कम करने के लिए आत्मनिर्भर भारत (Aatmanirbhar Bhaarat) पैकेज का ऐलान किया. राज्यसभा (Rajya Sabha) में सरकार की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक सरकार इस पैकेज के तहत 27 लाख करोड़ रुपये से अधिक का वित्तीय प्रोत्साहन दे रही है. इसके तहत इस साल 13 जुलाई तक करीब 59.54 लाख लाभार्थियों को लाभ पहुंचाया जा चुका है.

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स्वरोजगार की सुविधा के लिए सरकार ने प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (Prime Minister Mudra Yojana) शुरू की है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मुद्रा योजना के तहत इस साल 8 जुलाई तक करीब 35.94 करोड़ ऋण स्वीकृत किए गए थे. लेकिन इसका कोई फायदा जमीन पर दिखाई नहीं दे रहा. महामारी के दौरान जिन स्टार्ट-अप्स (Start Up) ने बड़ी संख्या में लोगों को काम दिया, अब वे भी लोगों को निकाल रहे हैं. अनुमान के मुताबिक स्टार्टअप के 11,000 से ज्यादा कर्मचारियों ने हाल ही में नौकरियां खो दी है. इतना ही नहीं इस साल के अंत तक ये संख्या 60,000 तक पहुंचने की आशंका जताई जा रही है.

पीएम मुद्रा योजना क्या है ?

PMMY के तहत छोटे स्तर पर कारोबार शुरू करने या पुराने काम को बढ़ाने के लिए सरकार 10 लाख रुपये तक के लोन देती है. इस योजना के तहत तीन तरह के लोन दिए जाते हैं. इसके तहत शिशु लोन, किशोर लोन और तरुण लोन दिए जाते है. शिशु लोन के तहत 50,000 रुपये, किशोर लोन के तहत 5 लाख रुपये और तरुण मुद्रा लोन के तहत दस लाख रुपये तक लोन मिल सकता है. लोगों ने इसके तहत लोन भी लिए हैं. लेकिन बताया जा रहा है कि इस योजना के तहत लोन लेने वालों में करीब 95 फीसदी ऐसे लोग हैं, जिन्होंने शिशु लोन के तहत लोन लिया. मगर उससे उनकी परेशानी खत्म नहीं हुई.

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देश की अर्थव्यवस्था का हाल

कोविड महामारी का असर कम होने के बाद अर्थव्यवस्था के संभलने की उम्मीद जताई जा रही थी. लेकिन महंगाई (Inflation) और रुपये में गिरावट ( Depreciation) ने पानी फेर दिया. जून में खुदरा महंगाई (Retail Inflation) दर 7.01% थी. वहीं जुलाई में डॉलर (Dollor) की तुलना में रुपया 80 के स्तर के पार कर गया. इससे भारत का आयात (Import) और महंगा होता जा रहा है. जिसके चलते घरेलू बाजार में चीजों के दाम बढ़ रहे हैं. आरबीआई (RBI) की एक रिपोर्ट की मानें तो कोरोना की वजह से अर्थव्यवस्था को हुए नुकसान से बाहर निकलने में एक दशक से ज्यादा वक्त लग सकता है.

रिपोर्ट के मुताबिक देश की अर्थव्यवस्था इस नुकसान की भरपाई वित्त वर्ष 2035 तक ही कर सकेगी. अनुमान के मुताबिक अर्थव्यवस्था को महामारी के चलते बीते 3 वर्षों में करीब 50 लाख करोड़ रुपये के आउटपुट का नुकसान हुआ है. रिपोर्ट के मुताबिक रिकवरी रेट धीमी है. इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड (IMF) ने भी वैश्विक कारणों और महंगे कर्ज का हवाला देते हुए 2022-23 के लिए भारत के GDP अनुमान में 0.8% की कमी कर उसे 8.2% से घटाकर 7.4% कर दिया गया है. साथ ही महंगाई पर काबू पाने के लिए कदम उठाने की सलाह दी गई है. यानी मुश्किलों का दौर अभी जारी रहने वाला है.

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