हाइलाइट्स

  • पहले विश्वयुद्ध में 9 गोलियां खाकर जिंदा बचे मानेकशॉ

  • 1971 युद्ध से पहले इंदिरा को बताई रणनीति

  • भारत के 8वें आर्मी चीफ बने थे सैम मानेकशॉ

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Field Marshal General Sam Manekshaw: 9 गोलियां खाकर सर्जन से कहा- गधे ने दुलत्ती मार दी, ऐसे थे मानेकशॉ

भारतीय सेना के पहले फील्ड मार्शल जनरल सैम मानेकशॉ का जन्म 3 अप्रैल 1914 को हुआ था... मानेकशॉ ने किस तरह अपने अदम्य साहस से देश की सेना को नई ऊंचाइयां दी, आइए जानते हैं इस आर्टिकल और वीडियो में...

भारतीय सेना के पहले फील्ड मार्शल, जनरल जैम मानेकशॉ ( Field Marshal General Sam Manekshaw ) का जन्म 3 अप्रैल 1914 को हुआ था... मानेकशॉ ने अपने अदम्य साहस और फैसलों से भारत-पाक 1971 की जंग में ( Indo-Pakistani War of 1971 ) देश को जीत दिलाई थी. तब पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना के सरेंडर ( Pakistani Army surrender 1971
) में मानेकशॉ के फैसलों का अहम रोल था. आइए आज जानते हैं भारत की सेना के शूरवीर मानेकशॉ की जिंदगी ( General Sam Manekshaw Life ) को करीब से... मानेकशॉ किस तरह की जिंदगी जीते थे? मानेकशॉ का इंदिरा से रिश्ता ( General Sam Manekshaw and Indira Gandhi Relation ) कैसा था? मानेकशॉ ने कैसे भारतीय सेना को मजबूत ( How Sam Manekshaw Strengthened the Indian Army ) किया? इसके साथ ही, मानेकशॉ को क्या सम्मान दिए ( What honors were given to Sam Manekshaw ) गए? इस लेख / वीडियो में हम उनकी जिंदगी को करीब से जानेंगे...

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1990 में इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट में अब्दुल कलाम ( A. P. J. Abdul Kalam ) के बगल में बैठे थे सैम मानेकशॉ... कलाम ने मानेकशॉ को अपना परिचय दिया... मानेकशॉ ने कलाम से उनकी उम्र पूछी... कलाम ने जब उम्र बताई, तो मानेकशॉ बोले- तुम तो अभी बच्चे हो... इसपर दोनों हंस दिए... सालों बाद 2006 में जब मानेकशॉ विलिंगटन के अस्पताल में भर्ती थे... तब कलाम उन्हें देखने पहुंचे... कलाम का हाथ थामकर मानेकशॉ बोले- तुम कैसे राष्ट्रपति हो? मैं पद पर नहीं हूं... फिर भी मुझे देखने चले आए... ! फील्ड मार्शल का तमगा पाने वाले भारत के पहले आर्मी ऑफिसर सैम मानेकशॉ जितने सख्त थे, उतने ही हाजिरजवाब भी... 3 अप्रैल 1914 को जन्मे मानेकशॉ का निधन जून 2008 में आज ही के दिन हुआ था... आइए झरोखा में आज पलटते हैं भारतीय सेना के जांबाज अफसर की जिंदगी के पन्ने को....

पहले विश्वयुद्ध में 9 गोलियां खाकर जिंदा बचे मानेकशॉ

साल 1942 ( World War I ) का वक्त... जापानी सेना बर्मा की ओर बढ़ ही थी... मुकाबला करने के लिए भारत से बटालियन को वहां भेजा गया... 22 फरवरी 1942 के दिन राइफल कंपनी के सब्सिट्यूट कमांडर को जापानी सेना की मशीनगन की गोलियां पेट में जा लगीं... वह बुरी तरह घायल हो गए... फेफड़े, गुर्दे और लीवर में 9 गोलियां लगीं... मेजर जनरल सर डी टी कोवांस, एम सी डिवीजन के जनरल कमांडिंग ऑफिसर सैम की सफलता पर उन्हें बधाई देने तो आए लेकिन हालात देखकर उन्हें लगा कि वे अब जिंदा नहीं बचेंगे... क्योंकि मिलिट्री क्रॉस सिर्फ से सिर्फ जीवित सिपाही को ही सम्मानित किया जाता है इसलिए सैम की नाजुक हालत को देखते हुए जनरल ने अपना मिलिट्री क्रॉस मानेकशॉ की छाती पर टांक दिया...

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अर्दली शेर सिंह मानने को तैयार नहीं था... वह उन्हें एक रेजीमेंटल ऐड पोस्ट ले गया जहां से रेजीमेंटल मेडिकल ऑफिसर कैप्टन जीएम दीवान ने उन्हें पेगु के अस्पताल भेज दिया... वहां ऑस्ट्रेलिया के सर्जन ने ये सोचकर ऑपरेशन करने से इनकार कर दिया कि शायद वे अब बचेंगे ही नहीं... अर्दली न सुनने को तैयार नहीं था... यह सब चल रहा था कि अफसर को होश आता है... डॉक्टर उनसे पूछता है, क्या हुआ? सैम ने जवाब दिया... एक हरामी खच्चर ने मुझे दुलत्ती मार दी... ये जवाब सुनकर डॉक्टर अपनी हंसी रोक न सके... उन्होंने कहा- तुम्हारे मजाकिया अंदाज का जवाब नहीं... तुम्हारी जान तो बचानी ही होगी... डॉक्टर ने आंत के ज्यादातर हिस्से काटकर हटा दिए और जख्मों को सिलकर सैम को वहां से रंगून भेज दिया... सैम की जिंदगी बच गई, जो किसी चमत्कार से कम नहीं था..

1971 युद्ध से पहले इंदिरा को बताई रणनीति

सालों बाद... मार्च 1971 में एक दिन... भारत के सेना प्रमुख सैम मानेकशॉ को इंदिरा गांधी ने बुलवाया और कहा कि पूर्वी पाकिस्तान में घुस जाओ... और आक्रमण कर दो. इसपर मानेकशॉ ने कहा- यह अभी मुमकिन नहीं... अगर हम अभी हमला करते हैं, तो जंग हार सकते हैं. मैं जंग जीतने के लिए लड़ता हूं, हारने के लिए नहीं... इंदिरा को ऐसे जवाब की उम्मीद बिल्कुल नहीं थी. पर मानेकशॉ ने आगे जब तर्क दिया कि मॉनसून सिर पर है, पूर्वी पाकिस्तान के नदी नाले उफान पर आ जाएंगे... ऐसे हालात का सामना हमारे जवान नहीं कर पाएंगे.

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अब इंदिरा का सवाल था- हम कब तक हमले की स्थिति में होंगे, मानेकशॉ ने कहा नवंबर तक... इंदिरा ने सहमति दे दी ... भारतीय सेना ने तैयारी शुरू कर दी... पूर्वी पाकिस्तान में मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व में मुक्ति वाहिनी पाकिस्तानी सेना से टकरा रही थी...

1971 युद्ध के नायक बने सैम मानेकशॉ

3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी एयरफोर्स ( Pakistan Air Force ) के कई जहाजों ने भारत में अमृतसर, पठानकोट, श्रीनगर, अवंतिपुर, उत्तरलाई, जोधपुर, अंबाला और आगरा के एयरबेस पर एकसाथ हमला बोला... भारतीय सेना को महीनों से इसी मौके का इंतजार था... ये जंग भारत ने पूरब और पश्चिम दोनों मोर्चों पर लड़ी और जीती... इस जंग ने इंदिरा को देश की नयी नायिका बना दिया... लेकिन इंदिरा जानती थीं, इस जीत का सच्चा नायक अगर कोई है, तो वो हैं सैम मानेकशॉ

सैम का पूरा नाम सैम होरमसजी फ्रामजी जमशेदजी मानेकशॉ ( Sam Hormusji Framji Jamshedji Manekshaw ) था... 3 अप्रैल 1914 को जन्मे मानेकशॉ एक पारसी थे... परिवार गुजरात के वलसाड शहर से पंजाब आया था... अमृतसर, नैनीताल से पढ़ाई करने के बाद वे देहरादून की इंडियन मिलिट्ररी अकैडमी पहुंचे... वह अकैडमी के पहले बैच के लिए चुने गए 40 छात्रों में से एक थे.

विभाजन के बाद 1947-48 में उन्होंने कश्मीर की जंग में अहम भूमिका निभाई. आजादी के बाद गोरखों की कमान संभालने वाले वे पहले भारतीय थे. गोरखों ने ही उन्हें सैम बहादुर नाम दिया... वे तरक्की की सीढ़ियां चढ़ते गए... नगालैंड की समस्या को सुलझाने के लिए 1968 में उन्हें पद्मभूषण का सम्मान दिया गया.

भारत के 8वें आर्मी चीफ बने थे सैम मानेकशॉ

7 जून 1969 को सैम मानेकशॉ ने जनरल कुमारमंगलम के बाद भारत के 8वें चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ का पद ग्रहण किया. मानेकशॉ खुलकर अपनी बात कहने वालों में से थे.. एक बार इंदिरा गांधी को उन्होंने मैडम कहने से इनकार कर दिया... उन्होंने कहा- यह संबोधन खास वर्ग के लिए होता है... वह उन्हें प्रधानमंत्री ही कहेंगे.

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कृष्ण मेनन को दिया था करारा जवाब

मानेकशॉ एक दिन जम्मू डिवीजन की कमान संभाल रहे थे... तभी रक्षामंत्री कृष्ण मेनन ( Defence Minister V. K. Krishna Menon ) उनसे मिलने आए. बातचीत में मेनन ने उनसे पूछा कि वे तब के सेनाध्यक्ष जनरल केएस थिमैया के बारे में क्या सोचते हैं? सैम ने उत्तर दिया... मुझे अपने चीफ के बारे में सोचने की अनुमति नहीं है. आज आप एक जनरल ऑफिसर से पूछ रहे हैं कि वह चीफ के बारे में क्या सोचता है, कल आप मेरे जूनियर से पूछेंगे कि वे मेरे बारे में क्या सोचते हैं, इस सोच से सेना के अनुशासन का विनाश निश्चित हैं, इस तरह का काम बिल्कुल न करें... सामने कोई भी शख्स क्यों न हो... कितना ही बड़ा उसका ओहदा क्यों न हो... सैम मानेकशॉ अपनी बात सीधी कह देते थे.

यही मेनन बाद में 1962 की हार के खलनायक बने... वह पद से हटा दिए गए...

सैम मानेकशॉ ने मुश्किल मोर्चों को चुना

सेना मुश्किल हालात से गुजर रही थी... 26 नवंबर 1964 को कलकत्ता स्थित पूर्वी कमान के मुख्यालय में सैम जी ओ सी इन सी के तौर पर नियुक्त किए गए थे. सवाल ये था कि जब वे पहले से ही पश्चिमी सेना की कमान संभाल रहे थे, तब शिमला से उनका तबादला कलकत्ता क्यों किया गया? दीपिंदर सिंह के अनुसार दिल्ली में रक्षामंत्री वाई बी चव्हाण के साथ एक बैठक में जब सैन्य कमांडर सैम से सवाल किया गया कि वह किस क्षेत्र को बेहद अहम मानते हैं, तो उन्होंने कहा पूर्वी कमान को. क्योंकि इसे चारों ओर से खतरा है. उत्तर में चीनियों से... दक्षिण में पूर्वी पाकिस्तान से, नगालैंड में बढ़ते विद्रोह और पश्चिम बंगाल में जारी संघर्ष से.. जब उनसे पूछा गया कि क्या वह इस कमान को संभालने की चुनौती लेंगे, तो उन्होंने इसे तुरंत स्वीकार कर लिया.

मई 1964 में पंडित जवाहर लाल नेहरू गंभीर रूप से बीमार थे, उस वक्त सेनाध्यक्ष जनरल चौधरी स्टाफ कॉलेज, वेलिंगटन ( Defence Services Staff College Wellington ) में अपना संबोधन देने गए थे. वेलिंगटन जाने से पहले उन्होंने पश्चिमी कमान के तत्कालीन कमांडर सैम मानेकशॉ को एक पत्र लिखा और उस मुहरबंद लिफाफे को उप सेनाध्यक्ष जनरल वडालिया के पास इस निर्देश से छोड़ा कि अगर पंडित नेहरू को कुछ हो जाता है, तो यह पत्र मानेकशॉ के पास पहुंचा दिया जाए...

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27 मई 1964 को नेहरू का स्वर्गवास हो गया. जनरल वडालिया ( General Mohinder Singh Wadalia ) ने मानेकशॉ को फोन किया और कहा- मैस्ट्रो (वाइस चीफ उन्हें मैस्ट्रो ही कहते थे), सेनाध्यक्ष ने आपके लिए एक मुहरबंद लिफाफा मेरे पास छोड़ा है. मैं उनके सभी निर्देश पढ़कर सुनाता हूं... कृपया गुप्त फोन पर आ जाइए. जब मानेकशॉ वहां पहुंचे तो वाइस चीफ ने सभी निर्देश पढ़ने शुरू किए...

आर्मी चीफ को लगा था कि अगर पंडित नेहरू का स्वर्गवास हो जाता है, तो हो सकता है कि राजधानी के हालात अस्त व्यस्त हो जाएं. इस स्थिति को नियंत्रण में करने के लिए सेना के जवानों की जरूरत पड़ सकती थी. लेकिन दिल्ली में तब कोई भी सैन्य टुकड़ी नहीं थी. इसलिए उन्होंने मानेकशॉ को निर्देश दिया था कि वे अंबाला से 4 इंफैंट्री डिवीजन ( 4 Infantry Division ) और आगरा से 50 पैराशूट ब्रिगेड ( 50th Parachute Brigade ) लेकर दिल्ली पहुंचे. मानेकशॉ ने इसका विरोध किया और कहा कि इससे गलत संदेश जाएगा... लेकिन चीफ की बात को दरकिनार नहीं किया... उन्होंने विरोध का पत्र चीफ को भेजा और आदेश का पालन करने चले गए...

1937 में एक सार्वजनिक समारोह के लिए लाहौर गए सैम की मुलाकात सिल्लो बोडे से हुई. दो साल की यह दोस्ती 22 अप्रैल 1939 को विवाह में बदल गई. 1969 को उन्हें सेनाध्यक्ष बनाया गया और 1973 में फील्ड मार्शल का सम्मान प्रदान किया गया.

27 जून 2008 को मानेकशॉ का निधन

1973 में सेना प्रमुख के पद से रिटायर होने के बाद वे वेलिंगटन, तमिलनाडु में बस गए थे. वृद्धावस्था में उन्हें फेफड़े संबंधी बीमारी हो गई थी और वे कोमा में चले गए. उनका निधन वेलिंगटन के सैन्य अस्पताल के आईसीयू में 27 जून 2008 को रात 12.30 बजे हुआ...

आइए चलते चलते आज की तारीख में हुई दूसरी घटनाओं पर भी एक नजर डाल लेते हैं-

2015 - भारत के फ़िल्म इतिहास में अपना एक ख़ास मुकाम रखने वाले सत्यजीत रे ( Satyajit Ray ) की तस्वीर को संयुक्त राष्ट्र ने अपने मुख्यालय में प्रदर्शित करने का फैसला किया

1964 - उड़नपरी पी. टी. ऊषा ( P. T. Usha ) का जन्म हुआ

1839 - महाराजा रणजीत सिंह ( Maharaja Ranjit Singh ) का निधन हुआ

(इस आर्टिकल के लिए रिसर्च मुकेश तिवारी @MukeshReads ने किया है)

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