हाइलाइट्स

  • 11 फरवरी 1847 को हुआ था थॉमस एडिसन का जन्म
  • एडिसन ने बनाया था इलेक्ट्रॉनिक वोट रिकॉर्डर
  • एडिसन ने बनाया टेलीग्राफ-स्टॉक मशीन का अडवांस वर्शन

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Story of Thomas Edison: क्या हुआ थॉमस एडिसन के बनाए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का? | Jharokha 30 Sep

Story of Thomas Edison : दुनिया के महानतम वैज्ञानिक थॉमस एडिसन ने बल्ब बनाकर दुनिया को रोशनी से परिचित कराया था. एडिसन की जिंदगी कैसी थी? कैसे वह एक महान वैज्ञानिक बने? आइए जानते हैं इस लेख में एडिसन की पूरी कहानी को.

Story of Thomas Edison : महान वैज्ञानिक थॉमस एडिसन बचपन में स्कूल नहीं जा सके थे. अपनी बीमारी को एडिसन ने रास्ते की मजबूरी नहीं बनने दिया. आइए जानते हैं आज इस वैज्ञानिक के बारे में और समझते हैं कि कैसे इसने इतिहास रच दिया.

11 फरवरी 1847 को हुआ था थॉमस एडिसन का जन्म

11 फरवरी 1847 को जन्मे महान वैज्ञानिक थॉमस एडिसन जिंदगी में एक हजार से ज्यादा पेटेंड कराए. लेकिन थॉमस ने सबसे पहले जिस आविष्कार को पेटेंट कराया वो क्या था, जानते हैं? 1 जून, 1869 को, थॉमस एडिसन ने अपने पहले आविष्कार इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को पेटेंट कराया था.

ये मशीन उन्होंने कांग्रेस के लिए बनाई थी. कमाल की बात ये है कि भारत में पहली बार 1982-83 में केरल के परूर में ईवीएम यूज हुई. एडिसन की सोच कितनी आगे की थी इसे आप इसी बात से समझ सकते हैं कि वह इस्तेमाल से सवा सौ साल पहले ही इसे बनाने का खाका खींच चुके थे.

हालांकि तब ये आविष्कार रद्दी की टोकरी में चला गया था लेकिन एडिसन ने इसी पहले आविष्कार के बाद फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

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आज हम थॉमस एडिसन की बात इसलिए कर रहे हैं क्योंकि साल 1882 में Thomas Edison के पहले commercial hydroelectric power plant ने आज ही के दिन काम करना शुरू किया था. बाद में इसे Appleton Edison Light Company के नाम से जाना गया.

जब एडिसन ने बनाया इलेक्ट्रॉनिक वोट रिकॉर्डर

1868 में बोस्टन पहुंचते ही एडिसन को टेलीग्राफर की जॉब मिल गई, जहां उनकी पोस्ट एक्सपर्ट टेलीग्राफ ऑपरेटर की था लेकिन इससे ज्यादा मजा उन्हें अपनी लेबोरेट्री में काम करने में आता था, जहां वे सर्वश्रेष्ठ संभावनाओं को उजागर करते थे. कहते हैं कि एडिसन सिर्फ 4 घंटे सोते थे और दिन में काम के बीच छोटी छोटी झपकियां लेते थे.

तब न्यूयॉर्क स्टेट लेजिसलेटर और वॉशिंगटन डीसी की सिटी काउंसिल दोनों ही बैलेट पेपर की प्रक्रिया को ऑटोमेटेड करने के तरीके खोज रहे थे. उस वक्त, लेजिसलेटर्स "हां" या "नहीं" कहकर अपना वोट करते थे... तब क्लर्क एक एक करके उनकी प्रतिक्रियाएं लिख लेता था.

एडिसन ने इस मौके को भुनाने की सोची और जल्द ही एक इलेक्ट्रॉनिक वोट रिकॉर्डर डेवलप कर लिया. वॉशिंगटन और न्यूयॉर्क दोनों ही शहरों की नगर परिषदें कम समय में वोटिंग प्रक्रिया करने का कोई कारगर तरीका खोज रही थी, ये बात उनके कानों तक भी जा पहुंची थी.

एडिसन के "इलेक्ट्रोग्राफिक वोट-रिकॉर्डर" में सभी मतदाताओं के नाम दो बार लिस्ट किए गए थे: एक तरफ "हां" कॉलम में, और दूसरी तरफ "नहीं" कॉलम में. जब कोई शख्स अपने वोट को इंडिकेट करने के लिए स्विच फ़्लिप करता, तो मशीन एक इलेक्ट्रिक करेंट के जरिए सिग्नल ट्रांसमिट करती थी और संबंधित कॉलम में उनका नाम दिखाई देता था.

वोटिंग के बाद, एक अटेंडेंट कॉलम के ऊपर कैमिकली ट्रीटेड पेपर की शीट रखता था और उस पर धातु का रोलर दबाता है, जो परिणाम के साथ कागज को छापता था.

एडिसन के मित्र डेविट रॉबर्ट्स ने उनके इस आविष्कार में सौ डॉलर का निवेश किया था और इस डिवाइस को कैपिटल हिल पर एक्जिबिशन में भी लगाया गया था. वे इसे संयुक्त राष्ट्र कांग्रेस के सामने प्रदर्शित करने के लिए अपने साथ ले गए. डेविट को पूरी उम्मीद थी कि समिति के सदस्य इन तकनीक के प्रदर्शन से प्रभावित होंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

कांग्रेस के सभी सदस्यों का रुख इसे लेकर फीका रहा और इसके भाग्य का फैसला करने वाले समिति के अध्यक्ष ने घोषणा की कि "अगर पृथ्वी पर कोई आविष्कार है जिसे हम यहां नहीं चाहते हैं, तो वह ये है."

कमिटी ने तब वोट-रिकॉर्डर को काम की चीज नहीं माना... दरअसल, वे पहली बार में प्रक्रिया तो तेज करना नहीं चाहते थे.

नेता नहीं चाहते थे चुनावी प्रक्रिया को तेज करना

जब समिति के विश्लेषकों ने इस मशीन को नकार दिया तो रॉबर्ट्स ने झल्लाकर पूछा- क्या आपको दिखाई नहीं देता कि यह मशीन कांग्रेस के दोनों सदनों का कितना समय बचा सकती है?

समिति के एक सदस्य ने कहा- बिल्कुल बर्खुद्दार, मैं देख सकता हूं... . लेकिन हम ऐसी कोई मशीन क्यों खरीदेंगे जिससे वोटिंग की प्रक्रिया कम वक्त में पूरी हो जाए. इस संस्था के लिए तो धीमी वोटिंग ही बेहतर है. क्योंकि वोटिंग जितनी धीमी होगी, राजनेताओं को रणनीतियां बनाने और नए गठबंधन करने के लिए उतना ही ज्यादा वक्त मिलेगा, साथ ही जरूरत होने पर वे वोटिंग सेशन टाल भी सकते हैं.

यह सुनते ही एडिसन ने शपथ ली कि आगे से वे ऐसी किसी भी चीज का आविष्कार नहीं करेंगे जिसकी बिक्री पहले से सुनिश्चित न हो. बोस्टन के शहर में एडिसन नए नए प्रयोग करते रहे और कई अच्छे लोगों के संपर्क में भी आए. अब एडिसन ने न्यूयॉर्क का रुख करने की सोची. दोस्त बेंजामिन ब्रेडिंग से उसने जहाज के टिकट के 35 डॉलर उधार लिए और न्यूयॉर्क पहुंच गए.

जब वह न्यूयॉर्क पहुंचे तो पहले दो हफ्ते में उन्हें कोई नौकरी नहीं मिली. उसके पैसे खत्म हो रहे थे लेकिन तभी एक चमत्कार हुआ. सड़क पर घूमते घूमते उसे दिखा कि एक ब्रोकरेज कंपनी की स्टॉक टिकट मशीन बिगड़ गई है और उसका मैनेजर परेशान है. एडिसन ने मशीन को हाथ में लिया और कुछ मिनटों में ठीक कर दिया. मैनेजर ने तभी खुश होकर एडिसन को 300 डॉलर/महीने की नौकरी पर रख लिया. उस जमाने में यह बड़ी तनख्वाह थी.

एडिसन ने बनाया टेलीग्राफ-स्टॉक मशीन का अडवांस वर्शन

एडिसन ने अगले कुछ महीनों में टेलीग्राफ में सुधार करने वाले यंत्र और स्टॉक टिकट मशीन का अडवांस वर्शन बना लिया और उसकी कंपनी ने इन सब आविष्कारों के बदले उसे 40 हजार डॉलर दिए. साल 1871 में ये रकम इतनी बड़ी थी कि एडिसन सारी रात जागकर इसे गिनते रहे.

इस पैसे से एडिसन ने नेवार्क न्यूजर्सी में एक छोटी लेबोरेट्री खोल ली और अगले 5 साल तक वह टेलीग्राफ मशीन के और भी अडवांस वर्शन के आविष्कार में जुट गए. इसी दरम्यान उसने मेरी नाम की लड़की से शादी की. साल 1876 में उन्होंने लेबोरेट्री बेचकर न्यूयॉर्क से 25 मील दूर मेनलो पार्क में एक नई लेबोरेट्री बना डाली. यह मॉडर्न लेबोरेट्री थी. यह प्रयोगशाला एडिसन के लिए मील का पत्थर साबित हुई और उसने यहीं से महानतम आविष्कारों की शुरुआत की.

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यहां सबसे पहला आविष्कार फोनोग्राफ का था. एक ऐसी मशीन जो आवाज रिकॉर्ड करके उसे फिर से बजा सकती थी, जिसे हम आज ऑडियो रिकॉर्ड कहते हैं. इस आविष्कार ने एडिसन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धी दिला दी. खुद अमेरिकी राष्ट्रपति ने उसे यह प्रयोग दिखाने के लिए वाइट हाउस बुलाया.

एडिसन ने इलेक्ट्रिक बल्ब का आविष्कार किया

अगला सबसे महत्वपूर्ण आविष्कार एडिसन ने इलेक्ट्रिक बल्ब का किया. उस वक्त इलेक्ट्रिक पर चलने वाली कोई चीज नहीं थी. एडिसन ने पूरा डेढ़ साल ऐसी चीज बनाने में लगा दिया और डेढ़ साल बाद जब इलेक्ट्रिक बल्ब बनाकर दुनिया के सामने पेश किया तो पूरी दुनिया की आंखें चौंधियां गईं. एडिसन का बनाया बल्ब लगातार डेढ़ घंटे चसता रहा. 1879 में उसने अपनी लैबोरेट्री में सैंकड़ों बल्ब लगाकर रोशन कर दिया तो दुनिया एक महान पर्व की शुरुआत की साक्षी बन गई.

1889 में एडिसन ने जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी स्थापित की

1882 में उसने पहला व्यावसायिक पावर स्टेशन भी बना दिया. इसने मैनहटन इलाके का 1 वर्ग किलोमीटर का एरिया प्रकाशमान कर दिया. इस आविष्कार ने एडिसन का जीवन बदलकर रख दिया. सफलता और नाम के साथ साथ एडिसन ने करोड़ों डॉलर कमाए. साल 1889 तक अपनी अलग अलग इलेक्ट्रिक कंपनी स्थापित करते रहे और 1889 में सबको मिलाकर एडिसन जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी स्थापित की, आगे चलकर जनरल इलेक्ट्रिक यानी जीई हुई और आज भी दुनिया की सबसे बड़ी प्रमुख कंपनियों में से एक है.

एडिसन की पहली पत्नी का निधन हुआ और उन्होंने फिर दूसरी शादी की. एडिसन ने मोशन पिक्चर तकनीक का भी आविष्कार किया, जिसकी वजह से आज हम सिनेमा देख पा रहे हैं. एडिसन ने अपने जीवन में 1 हजार से ज्यादा पेटेंट रजिस्टर कराए.

सबसे बड़ी बात ये कि बगैर किसी औपचारिक शिक्षा के एक शख्स ने दुनिया को महान भेटें दी, सिर्फ अपनी कौतूहल और जिज्ञासा की वजह से. इसका सबसे बड़ा श्रेय एडिसन के माता-पिता को जाता है, जिन्होंने अपने बच्चे पर भरोसा करके उसका आत्मविश्वास बढ़ाया घटाया नहीं... बचपन में अटेंशन डेफिसिट हाइपर एक्टिव डिसऑर्डर के चलते 3 महीने बाद ही उन्हें स्कूल से हटा लिया गया था. घर में उन्हें मां ने ही पढ़ाया. 12 वर्ष की उम्र में उनकी सुनने की क्षमता भी खत्म हो गई थी लेकिन उन्होंने माता-पिता और पुस्तकों से लगातार सीखना जारी रखा...

चलते चलते 30 सितंबर को हुई दूसरी घटनाओं पर एक नजर डाल लेते हैं

1687 - औरंगजेब ने हैदराबाद के गोलकुंडा के किले (Golconda Fort) पर क़ब्जा किया

2001 - कांग्रेस के वरिष्ठ नेता माधव राव सिंधिया (Madhav Rao Scindia) का निधन

1841 - अमेरिका के मशहूर वैज्ञानिक सैमुएल स्लॉकम (Samuel Slocum) ने 'स्टेप्लर' का पेटेंट कराया

1968 - बोइंग 747 (Boeing 747) को पहली बार जनता को दिखाया गया

अप नेक्स्ट

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