वीओ: पश्चिम बंगाल के बाद जिस राज्य में बीजेपी ने अपना पूरा दमखम झोंका है वो है केरल. धुर दक्षिण के इस राज्य में दक्षिणपंथी विचारधारा बीते कई सालों से अपनी जमीन को मजबूत करने और 10 या 10 से ज्यादा सीटों पर कमल खिलाने की कोशिश में है. हालांकि उसको कितनी सफलता मिलेगी ये तो नतीजे ही बताएंगे लेकिन इतना जरूर है कि केरल में बीजेपी के पास खोने को बहुत कम और पाने को काफी ज्यादा है. बीते चुनाव में केवल एक विधानसभा सीट जीतने वाली बीजेपी इस बार 115 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और उसने 25 सीटें एनडीए के सहयोगी दलों को दे रखी हैं. केरल में यूं तो कांग्रेस और एलडीएफ का बोलबाला है. पिछले चुनाव में वाम दलों वाले एलडीएफ को 91 और कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट यानी UDF को 47 सीटें मिली थीं. यहां बहुमत के लिए 71 सीटें चाहिए. केरल में फिलहाल CPM के नेतृत्व वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट यानी LDF की सरकार है और पिनराई विजयन मुख्यमंत्री हैं.
प्रदेश में जहां बीजेपी के नेता 25 से ज्यादा सीटों पर जीत की आस लगाए बैठे हैं वहीं विपक्ष का कहना है कि बीजेपी अपनी पिछली जीती सीट भी बचा ले तो काफी होगा. ये सीट है नेमोम और इस बार इस सीट पर भी मुकाबला कांटे का है. नेमोम के अलावा जिन सीटों पर बीजेपी को कमल खिलने की आस है वो हैं पलक्कड़, कझाकुट्टम, कोन्नि और मंजेश्वरम.
ऐसा नहीं है कि भगवा दल को 25 पार सीटों की उम्मीद यूं ही जग गई है. बीजेपी लगातार राज्य में जमीनी स्तर पर काम कर रही है और चुनाव दर चुनाव उसका वोटिंग पर्सेंटेज बढ़ा ही है. विपक्षी नेता और जानकार भी मानते हैं कि बीजेपी जीते भले ही न पाए लेकिन वो अपने पाले में पहले से ज्यादा वोटों को लाने में जरूर कामयाब होगी. पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी के 15 प्रतिशत से अधिक हासिल किए वोट शेयर को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता. इसके अलावा नौ सीटों में पार्टी को 30 प्रतिशत से अधिक वोट मिले थे. कुछ महीने पहले हुए स्थानीय चुनाव में भी पार्टी ने बेहतर प्रदर्शन किया था. इन चुनावों में एनडीए को 1182 ग्राम पंचायतों, 37 ब्लॉक पंचायत, 2 जिला पंचायत, 320 नगर पालिका वार्ड और 59 नगर निगम वार्ड में जीत हासिल हुई थी.
राज्य में मुद्दों की बात करें तो बीजेपी के पास तीन सबसे अहम मुद्दे हैं. पहला- उसने मेट्रोमैन ई श्रीधरन के रूप में ऐसे नेता को सामने किया है जिसके व्यक्तित्व को नकारना किसी के भी बस की बात नहीं है. उनको सामने रख बीजेपी ने सुशासन का दांव खेला है. ये दांव इस लिए भी चल सकता है क्योंकि केरल की जनता LDF और UDF दोनों को कई बार आजमा चुकी है और बीजेपी दोनों के ही शासन को कुशासन का नाम दे चुकी है. तीसरा सबसे अहम मुद्दा है हिंदुत्व का जिसको सबरीमाला के जरिए बीजेपी ने केरल में आगे बढ़ाया है. लेकिन इस बार बीजेपी की नजर हिन्दुओं के साथ साथ ईसाई मतदाताओं पर भी रही और ये प्रधानमंत्री मोदी के इस बयान से बखूबी समझा जा सकता है.
नेता अपने दांव चल चुके हैं और जनता अपना फैसला सुना चुकी है. अब से कुछ ही देर में इस फैसले का ऐलान होना बाकी है जिस से स्पष्ट हो जाएगा कि केरल की जनता का बल किसके साथ है.