हाइलाइट्स

  • ताजमहल के ईर्द गिर्द क्यों है सवालों का जाल?
  • आगरा क्षेत्र के आस-पास जाटों का प्रभुत्व रहा है: दावा
  • ताजमहल का गुंबद कमल से ढंका हुआ है

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दुनिया के सातवें अजूबे, विश्वविरासत ताजमहल के ईर्द गिर्द क्यों है सवालों का जाल ? भगवा वेशधारी यहां क्यों चले आते हैं शिवलिंग के दर्शन करने या आरती करने? और अब कोर्ट में याचिकाएं दायर कर ताजमहल के किस इतिहास का सच सामने लाने की मांग की जा रही हैं.

दुनिया के सातवें अजूबे, विश्वविरासत ताजमहल के ईर्द गिर्द क्यों है सवालों का जाल ? भगवा वेशधारी यहां क्यों चले आते हैं शिवलिंग के दर्शन करने या आरती करने? और अब कोर्ट में याचिकाएं दायर कर ताजमहल के किस इतिहास का सच सामने लाने की मांग की जा रही हैं. आखिर क्या छिपा है ताजमहल में और क्या है इसके 22 कमरों का रहस्य ? गुंबद पर बना कलश और अर्धचंद्र अपने पीछे किस कहानी को दबाए बैठा है? कहते हैं कि एक झूठ अगर 100 बार कहा जाए तो वह सच लगने लगता है, क्या ये दावे भी वैसे ही हैं या इनके पीछे कोई ठोस आधार भी है. आज हम इसी की पड़ताल करेंगे...

ताजमहल पर याचिका अभी सामने आई हैं लेकिन इसके आजू-बाजू सवालों के किस्से पुराने हैं. 2017 तक, ताजमहल के हिंदू मंदिर होने को लेकर अदालत में कई याचिकाएं डाली जा चुकी थीं. ये सभी याचिकाएं पी.एन. ओक की किताब The True Story of the Taj से प्रेरित थीं. 2017 में भारतीय जनता पार्टी के विनय कटियार ने दावा किया था कि 17 वीं शताब्दी के स्मारक को मुगल सम्राट शाहजहां ने "तेजो महालय" नाम के हिंदू मंदिर को नष्ट करके बनाया था. उनका दावा था कि मंदिर में एक शिवलिंग था.

ऐसा ही दावा बीजेपी के एक दूसरे सदस्य लक्ष्मीकांत बाजपेयी ने भी 2014 में किया था. ताजमहल के शिव मंदिर होने के बारे में बातें तब सामने आने लगी जब पी.एन. ओक ने अपनी पुस्तक "ताज महल: द ट्रू स्टोरी" का विमोचन किया. उन्होंने दावा किया था कि इस इमारत को असलियत में 1155 ईस्वी में बनाया गया था, न कि 17वीं शताब्दी में.

2017 में एक विवाद तब भी पैदा हुआ जब उत्तर प्रदेश सरकार ने इसे अपनी आधिकारिक पर्यटन पुस्तिका "उत्तर प्रदेश पर्यटन - असीमित संभावनाएं" में शामिल नहीं किया.

अगस्त 2017 में, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने कहा कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि स्मारक में कभी मंदिर था. खुद बीजेपी सरकार भी ऐसे दावों को नकार चुकी है. केंद्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने नवंबर 2015 में संसद के एक सत्र के दौरान कहा था कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि ताजमहल से पहले वहां कोई मंदिर था.

तो फिर विवाद है क्यों? एक नजर डालते हैं पुरुषोत्तम नागेश ओक ( पीएन ओक ) के दावों पर...

"महल" एक इस्लामिक नाम नहीं है. अफगानिस्तान से लेकर अल्जीरिया तक दुनिया भर के किसी भी मुस्लिम देश में "महल" नाम से कोई इमारत नहीं है.

लोग मानते हैं कि ताजमहल शब्द को मुमताज महल नाम से लिया गया होगा, जिनको यहीं दफ्न किया गया. हालांकि सच ये है कि उनका नाम मुमताज महल था ही नहीं, उनका नाम Mumtaz-ul-Zamani था. कभी भी किसी को नाम देने के लिए नाम के तीन अक्षर Mum नहीं छोड़े जा सकते. अगर किसी परिस्थिति में ऐसा होता भी है तो नाम Taj न होकर Taz होना चाहिए था. जबकि ताजमहल का अंग्रेजी शब्द Taj Mahal है.

इसके अलावा, अगर ताज को एक कब्रगाह माना जाता है, तो महल शब्द, यानी हवेली का नाम उस पर कैसे लागू हो सकता है?

मंदिर को लेकर पी एन ओक के दावे

ताजमहल शब्द संस्कृत शब्द तेजोमहालय के ही अपभ्रंश जैसा है, जिसमें अग्रेश्वर महादेव यानि आगरा के भगवान विराजमान थे.

संगमरमर के चबूतरे पर चढ़ने से पहले जूते उतारने की परंपरा शाहजहां के दौरे से पहले की हो सकती है. अगर ताज की उत्पत्ति एक मकबरे के तौर पर हुई होती, तो जूते उतारने की जरूरत नहीं होती क्योंकि कब्रिस्तान में जूते की जरूरत होती है.

आगरा क्षेत्र के आस-पास जाटों का प्रभुत्व रहा है. यह शिव के जिस नाम की उपासना करते थे, उनका नाम तेजाजी था. द इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया (जून 28,1971) के जाट विशेष अंक में उल्लेख किया गया है कि जाटों के पास तेजा मंदिर हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि तेज-लिंग, शिव लिंगों के कई नामों में से एक है.

दस्तावेज पर पीएन ओक के दावे

शाहजहां के दरबार का इतिहास, बादशाहनामा (पृष्ठ 403, खंड 1) बताता है कि मुमताज को दफ्न करने के लिए गुंबद से सजी एक शानदार भव्य हवेली, जयपुर के महाराजा जयसिंह से ली गई थी, तब इमारत को राजा मानसिंह के महल के रूप में जाना जाता था.

ये भी देखें- खास व्यू प्वाइंट से ताज का दीदार करने पर अब जेब होगी ज्यादा ढीली

राजकुमार रहते हुए औरंगजेब ने अपने पिता, सम्राट शाहजहां को पत्र लिखा था. यह 'आदाब-ए-आलमगिरी', 'यादगारनामा' और 'मुरुक्का-ए-अकबराबादी' में दर्ज है (सैद अहमद, आगरा द्वारा संपादित, 1931, पृष्ठ 43 , फुटनोट 2). उस पत्र में औरंगजेब ने 1652 ई. में ही लिखा है कि मुमताज की काल्पनिक कब्रगाह में कई इमारतें सात मंजिला हैं और इतनी पुरानी हैं कि वे सभी लीक हो रही हैं. गुंबद के उत्तर में एक ओर दरार भी बन गई है. इसलिए, औरंगजेब ने आदेश दिया कि उनके अपने खर्च पर इमारतों की तुरंत मरम्मत की जाए और सम्राट के आदेश के बाद विस्तार से ये काम किया जाए. ओक ने यह बताते हुए कहा है कि यह इस बात का प्रमाण है कि शाहजहाँ के शासन काल में ही ताज परिसर इतना पुराना था कि उसकी तुरंत मरम्मत की जरूरत थी.

संगमरमर की मांग करने वाले तीन फरमान मुमताज की मौत के करीब दो साल के अंदर जयसिंह के पास भेज दिए गए थे. अगर शाहजहां ने असलियत में ताजमहल को 22 साल की अवधि में बनवाया होता, तो मुमताज की मौत के तुरंत बाद नहीं बल्कि 15 या 20 साल बाद ही संगमरमर की जरूरत होती.

यूरोपियन आगंतुकों पर ओक के दावे

1632 में (मुमताज़ की मौत के एक साल के अंदर) आगरा के एक अंग्रेज पीटर मुंडी ने लिखा- आगरा और उसके आसपास की जगहों में ताज-ए-महल का मकबरा, बाग और बाजार हैं. उसने पुष्टि की कि ताजमहल, शाहजहां के दौर से पहले भी एक अहम इमारत थी.

फ्रांसीसी आगंतुक बर्नियर ने लिखा है कि गैर-मुस्लिमों को तहखाने में प्रवेश करने से रोक दिया गया था. (यह वह वक्त था जब शाहजहां ने मानसिंह के महल की मांग की थी) तहखाने में एक चमकदार रोशनी थी. जाहिर है, उन्होंने चांदी के दरवाजे, सोने की रेलिंग, रत्न जड़ित जाली और शिव की मूर्ति पर लटके मोतियों के तार का जिक्र किया होगा.

डोम पर ओक के दावे

ताजमहल में एक गुंबद है. ऐसा गुंबद किसी मकबरे में दिखाई नहीं देता है. हिंदू मंदिरों में ऐसे गुंबद जरूर दिखाई देते हैं.

ताजमहल का डोम कमल से ढका हुआ है. इस्लामिक डोम खुले होते हैं.

ताजमहल का प्रवेश द्वार दक्षिण की ओर है. अगर ताज एक इस्लामी इमारत होती तो उसकी दिशा पश्चिम की ओर होनी चाहिए थी.

ये तो वे दावे हैं जो P. N. Oak ने अपनी पुस्तक में किए. इन दावों के फेहरिस्त बहुत लंबी है लेकिन हम इनमें से कुछ ही आपको बता रहे हैं.

भारत सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण क्या कहते हैं

देश के स्मारकों की देखरेख करने वाला, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण पारसी, मुग़ल और भारतीय शैली पर बने ताजमहल को "मुगल वास्तुकला के शिखर" के रूप में बताता है. भारत सरकार की ताजमहल पर बनी आधिकारिक वेबसाइट भी कहती है कि मुगल वास्तुकला का काल किसी शैली की परिपक्वता का सबसे अच्छा उदाहरण है जिसने अपने स्वदेशी वास्तुकलाओं के साथ इस्लामिक वास्तुकला का मेल तैयार किया.

Archaeological Survey of India के पूर्व रीजनल डायरेक्टर (उत्तर), K. K. Muhammed भी इसपर बयान दे चुके हैं. के. के. मोहम्मद का बयान इसलिए भी अहम है क्योंकि उन्हीं की वजह से मध्य प्रदेश के बटेश्वर में मंदिरों की श्रृंखला अपने मूल स्वरूप में लौट सकी.

उन्होंने कहा कि मैंने 100 से अधिक मंदिरों को फिर से खड़ा करने पर काम किया है और शिव, गणपति और विष्णु के बारे में अच्छी जानकारी रखता हूं, लेकिन मैंने तेजो महालय के बारे में नहीं सुना है. मैंने ताजमहल के अंदरूनी हिस्से देखे हैं, उसके अंदर बस बहुत सारे खाली कमरे हैं, जिनका निर्माण संरचना की ऊंचाई बढ़ाने के लिए किया गया था. यह एक अनावश्यक विवाद है.

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