हाइलाइट्स

  • सुप्रीम कोर्ट में 'रेवड़ी कल्चर' पर सुनवाई
  • 'रेवड़ी कल्चर' को SC ने बताया गंभीर मुद्दा
  • प्रधानमंत्री मोदी भी उठा चुके हैं सवाल
  • 'रेवड़ी कल्चर' पर RBI ने जारी की चेतावनी
  • कई राज्यों पर बढ़ा कर्ज का बोझ

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देश की सियासत में जारी 'रेवड़ी कल्चर' को लेकर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में सुनवाई चल रही है. कोर्ट ने चुनावों के दौरान फ्री वाले वादे करने से रोकने के लिए जरूरी समाधान खोजने के निर्देश दिए हैं. पूरे मामले में अगली सुनवाई 3 अगस्त को होगी. 

देश की सुप्रीम अदालत (Supreme Court) की चौखट पर मुफ्तखोरी या यूं कहें 'रेवड़ी कल्चर' (Revadi Culture) पर सुनवाई चल रही है. सवाल है कि मुफ्तखोरी की सियासी परंपरा कब और कैसे खत्म होगी. मुफ्तखोरी के खिलाफ याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इसे गंभीर मुद्दा बताया.

हालांकि केंद्र सरकार (Union Government) और चुनाव आयोग (Election Commission) दोनों ने ही खुद को इस मामले से दूर रखने की कोशिश की. लेकिन सुनवाई के दौरान कोर्ट ने केंद्र सरकार को सियासी दलों को फ्री वाले चुनावी वादों करने से रोकने के लिए जरूरी समाधान खोजने और हलफनामा दाखिल करने के निर्देश दिए. पूरे मामले पर अब 3 अगस्त को अगली सुनवाई होगी.

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इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने भी 16 जुलाई 2022 को बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे (Bundelkhand Expressway) का उद्घाटन करने के दौरान अपने संबोधन में 'रेवड़ी कल्चर' का जिक्र किया था. पीएम ने इसके नुकसान के बारे में बताया था और लोगों को इससे बचने की सलाह दी थी. ऐसे में इन दिनों 'रेवड़ी कल्चर' चर्चा का विषय बना हुआ है.

'रेवड़ी कल्चर' भले ही चुनाव (Election) जीतने और सत्ता पाने की गारंटी बन चुका हो. लेकिन इसका नतीजा यह हो रहा है कि राज्यों की आर्थिक सेहत (Economic Condition) बिगड़ने लगी है और वो कर्ज (Debt) की बोझ तले दबने लगे हैं. जाहिर है अगर खर्च ज्यादा और आमदनी कम हो, फिर कर्ज तो लेना ही पड़ेगा.

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क्या है 'रेवड़ी कल्चर' ?

देश के दक्षिण राज्यों खासकर तमिलनाडु (Tamil Nadu) में सबसे पहले मुफ्त बांटने की सियासत शुरू हुई. यहां चुनाव जीतने के लिए मंगलसूत्र, टीवी (TV), प्रेशर कुकर (Pressure Cooker), वॉशिंग मशीन (Washing Machine) और साड़ी ( Sarees) फ्री में बांटी जाने लगी. तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता के कार्यकाल में अम्मा कैंटीन खूब फली-फूली.

दक्षिण भारत (South India) के बाद अब यह उत्तर भारत (North India) के साथ-साथ पूरे देश में वोट पाने का एक शॉर्टकट जरिया बन चुका है. वोटरों को लुभाने के लिए राजनीतिक दलों ने मुफ्त बिजली-पानी, अनाज, लैपटॉप, मोबाइल, स्कूटी और बेरोजगारी भत्ता को हथियार बनाया. इसका नतीजा ये हुआ कि आज कई राज्यों की अर्थव्यवस्था कर्ज के बोझ तले दबने लगी है.

RBI की चेतावनी

इससे पहले रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (Reserve Bank Of India) भी 'रेवड़ी कल्चर' से देश को होने वाले नुकसान को लेकर आगाह कर चुका है. 'स्टेट फाइनेंसेस: अ रिस्क एनालिसिस' (Finances: A Risk Analysis) नाम से आई आरबीआई की रिपोर्ट की मानें तो पंजाब, राजस्थान, केरल, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों की हालत डांवाडोल है.

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कैग (CAG) के डेटा के हवाले से इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सब्सिडी (Subsidy) पर राज्य सरकारों के खर्च में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. जिससे कर्ज बढ़ता जा रहा है. वित्त वर्ष 2020-21 में सब्सिडी पर राज्यों ने कुल खर्च का 11.2% खर्च किया था. जो 2021-22 में बढ़कर 12.9% हो गया. सब्सिडी पर सबसे ज्यादा खर्च उत्तर प्रदेश, ओडिशा, झारखंड, केरल और तेलंगाना ने किया.

वहीं पंजाब, गुजरात और छत्तीसगढ़ सरकार ने सब्सिडी पर अपने रेवेन्यू एक्सपेंडिचर (Revenue Expenditure) का 10% से ज्यादा खर्च किया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य सरकारें सब्सिडी की बजाय मुफ्त दे रहीं हैं. जिससे फ्री पानी, फ्री बिजली, बिल माफी और कर्ज माफी से सरकारों को कोई कमाई नहीं हो रही है. उल्टे सरकार को इस पर खर्च करना पड़ रहा है.

RBI के मुताबिक कुछ ऐसे राज्य हैं जिनका कर्ज 2026-27 तक सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) का 30% से ज्यादा हो सकता है. ऐसे राज्यों में पंजाब की हालत ज्यादा खराब होगी. पंजाब सरकार पर GSDP का 45% से ज्यादा कर्ज होने का अनुमान है. तो वहीं राजस्थान, केरल और पश्चिम बंगाल का कर्ज भी 35% तक होने की संभावना है.

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किस राज्य पर कितना कर्ज ?

RBI के मुताबिक सभी राज्य सरकारों पर मार्च 2021 तक करीब 69.47 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज है. फिलहाल तमिलनाडु पर 6.59 लाख करोड़, यूपी पर 6.53 लाख करोड़, महाराष्ट्र पर 6.08 लाख करोड़, पश्चिम बंगाल 5.62 लाख करोड़, राजस्थान 4.77 लाख करोड़, गुजरात 4.02 लाख करोड़ और आंध्र प्रदेश 3.98 लाख करोड़ का कर्ज है. पंजाब और राजस्थान में चुनावी साल में सियासी दलों की ओर से जमकर रेवड़ियां बांटी गईं. जिससे दोनों ही राज्य आर्थिक संकट (Economic Crisis) के मुहाने पर खड़ा हो गया है.

'रेवड़ी कल्चर' के साइड इफेक्ट

'रेवड़ी कल्चर' से जहां राज्यों की आर्थिक सेहत पर बुरा असर हो रहा है. तो वहीं दूसरे स्तर पर भी साइड इफेक्ट्स (Side Effects) देखने को मिल रहे हैं. पंजाब में साल 1971 में सिर्फ 1,92,000 ट्यूबवेल थे. लेकिन बिजली बिल में माफी और सब्सिडी मिलने से इसकी संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई. आज यहां ट्यूबवेल की संख्या 14.1 लाख तक पहुंच गई है. इससे भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है. आलम यह है कि अधिक दोहन के चलते भूजल 20 से 30 मीटर नीचे चला गया है. जिससे पंजाब बहुत बड़े जलसंकट की ओर बढ़ रहा है.

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'रेवड़ी कल्चर' पर सियासत

एक ओर जहां 'रेवड़ी कल्चर' से देश और राज्य को नुकसान हो रहा है. तो वहीं दूसरी ओर कुछ सियासी दल के नेता इसे भगवान का प्रसाद मानते हैं. दिल्ली के सीएम और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल (CM Arvind Keriwal) का कहना है कि फ्री बिजली देना, अच्छे स्कूल बनाना, फ्री में बढ़िया इलाज करना भगवान का प्रसाद है. मगर अपने दोस्तों, मंत्रियों को फ्री की रेवड़ी देना पाप है. एसपी प्रमुख अखिलेश (SP Chief Akhilesh Yadav) यादव ने भी पीएम के बयान पर चुटकी लेते हुए एक ट्वीट किया था. जिसमें उन्होंने लिखा था- 'रेवड़ी बांटकर थैंक्यू का अभियान चलवाने वाले सत्ताधारी अगर युवाओं को रोजगार दें तो वो 'दोषारोपण संस्कृति' से बच सकते हैं. रेवड़ी शब्द असंसदीय तो नहीं?'

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