हाइलाइट्स

  • जिन्ना और लियाकत ने ब्रिगेडियर उस्मान को दिया था ऑफर
  • पाकिस्तान में रहने पर सेना प्रमुख बनाने का दिया था लालच
  • उस्मान ने ऑफर ठुकराया, कहा- भारत ही मेरा मुल्क है
  • सेना में जय हिंद कहने की परंपरा उस्मान ने ही शुरू कराई

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15 July Jharokha : पाकिस्तान ने भारतीय ब्रिगेडियर उस्मान के सिर पर क्यों रखा था 50 हजार का इनाम?

आज झरोखा में हम जानेंगे ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान (Brigadier Mohammad Usman) की कहानी को... 1947 के भारत-पाक युद्ध में उस्मान ने ऐसा परचम लहराया था कि उन्हें नौशेरा के शेर की उपाधि मिल गई थी...

Today's History 15 July : ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान (Brigadier Mohammad Usman) का जन्म 15 जुलाई 1912 को हुआ था. महावीर चक्र (Mahavir Chakra) से सम्मानित मोहम्मद उस्मान 1947 के भारत-पाकिस्तान युद्ध (Indo-Pakistani War of 1947–1948) के दौरान शहादत प्राप्त करने वाले भारतीय सेना के सर्वोच्च रैंक के अधिकारी थे. 3 जुलाई 1948 को मां भारती के लिए लड़ते हुए उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए थे. एक मुसलमान के तौर पर, उस्मान भारत की धर्मनिरपेक्षता के प्रतीक बन गए. 1947 में भारत विभाजन के समय उन्होंने पाकिस्तानी सेना में जाने से इनकार कर दिया था और भारतीय सेना में ही रहने के लिए हामी भरी थी. वह जुलाई 1948 में जम्मू और कश्मीर में पाकिस्तानी सैनिकों और मिलिशिया से लड़े.

बंटवारे के बाद भारत में रहे मोहम्मद उस्मान

ये किस्सा उन दिनों का है जब साल 1947 में देश आजाद हो रहा था... देश का बंटवारा हो रहा था...राज्य बंट रहे थे...लोग बंट रहे थे और सेना भी बंट रही थी. मुल्तान, जैकबाबाद, लाहौर, अंबाला, रावलपिंडी और पंजाब की तमाम जगहों पर दंगे हो रहे थे...ऐसे माहौल में बलूच रेजीमेंट के ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान से पूछा गया- वे किस मुल्क में रहेंगे. उस्मान ने तुरंत जवाब दिया- भारत. रेजीमेंट के दूसरे अधिकारियों ने कहा- फिर से विचार करो, मुसलमान हो...पाकिस्तान में ही रह लो. लेकिन उस्मान अपने फैसले पर अड़े रहे.

नौशेरा के शेर बने मोहम्मद उस्मान

बात सिर्फ यहीं खत्म नहीं हुई. मोहम्मद अली जिन्ना (Muhammad Ali Jinnah) और पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली (Liaquat Ali Khan) ने भी उस्मान को जल्दी प्रोमोशन का ऑफर दिया. दावा किया जाता है कि उस्मान को पाकिस्तान सेना का अध्यक्ष बनने का भी ऑफर दिया गया. लेकिन कोई पैंतरा काम ना आया. उस्मान टस से मस नहीं हुए. बाद में उन्हीं मोहम्मद उस्मान को ‘नौशेरा के शेर’ (Naushera ka Sher) का खिताब मिला...

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साल 1948 की लड़ाई में उन्होंने ऐसी बहादुरी दिखाई कि तिलमिलाए पाकिस्तान ने उनका सिर कलम करने वाले को 50 हजार का इनाम देने का ऐलान कर दिया...जी हां आज की तारीख 15 जुलाई का संबंध उन्हीं ब्रिगेडियर उस्मान से है...नमस्कार मैं हूं मुकेश और आप देख रहे हैं देश-दुनिया की ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ा हमारा शो झरोखा.

उत्तर प्रदेश के मऊ में हुआ मोहम्मद उस्मान का जन्म

बात 15 जुलाई 1912 की है. पूर्वी उत्तर प्रदेश के मऊ ज़िले (Mau District in Uttar Pradesh) के बीबीपुर गाँव में रहने वाले बनारस के कोतवाल मोहम्मद फारुक के घर एक बालक जन्म हुआ उसका नाम रखा गया मोहम्मद उस्मान. ये बालक कुछ अलग था...इसका पता तब चला जब महज 12 साल की उम्र में उसने ऐसा कारनामा किया जिसने सभी को अचंभे में डाल दिया. हुआ यूं कि बालक उस्मान सड़क से गुजर रहे थे तभी पास के कुएं के पास भीड़ देखी. पता चला कोई कुएं में डूब रहा है. उस्मान ने तुरंत ही कुएं में छलांग लगाई और उस शख्स को बाहर निकाल ले आए.

मानेकशॉ-मूसा के बैचमेट थे उस्मान

बहरहाल, उस्मान आगे की पढ़ाई के लिए बनारस चले गए. वहीं उन्होंने सेना में जाने का फैसला किया. एक जनवरी 1934 को वे ब्रिटिश सेना की रॉयल अकादमी (British Army Royal Academy) से पास होकर निकले. खास बात ये है कि सैम मानेकशॉ (Sam Manekshaw) और मोहम्मद मूसा (General Muhammad Musa Khan) उनके बैचमेट थे जो बाद में भारतीय और पाकिस्तानी सेना के चीफ़ बने. उस्मान की पोस्टिंग बलूच रेजीमेंट हुई...जिसमें रहते हुए उन्होंने तब के बर्मा में जापानियों के खिलाफ न सिर्फ जंग लड़ी बल्कि कई मोर्चे पर फतह भी हासिल की. देश के बंटवारे के बाद उन्होंने तमाम ऑफरों को ठुकराते हुए भारत में ही रहने का फैसला किया.

1947 का भारत-पाकिस्तान युद्ध

पाकिस्तान के कबाइलियों ने पाकिस्तानी सेना की मदद से कश्मीर पर हमला बोल दिया. 7 नवंबर 1948 तक इन कबाइलियों ने राजौरी, नौशेरा, मीरपुर, कोटली और पुंछ पर कब्जा कर लिया. तब मेजर जनरल कलवंत सिंह ने 50 पैरा ब्रिगेड को इन जगहों पर दोबारा कब्जा करने का आदेश दिया. तब ये काम काफी मुश्किल लग रहा था. कई दिनों तक चली जंग में 50 पैरा ब्रिगेड के कमांडर मेजर परांजपे घायल हो चुके थे उनके सैनिक नौशेरा में तैनात तो थे लेकिन चारों तरह से पाकिस्तानी सैनिकों से घिरे हुए थे. वो तारीख थी 24 दिसंबर और 25 दिसंबर को मोहम्मद अली जिन्ना का जन्मदिन था लिहाजा पाकिस्तानी सेना उन्हें नौशेरा बतौर गिफ्ट देना चाहती थी. कबाइलियों ने पाकिस्तानी सेना की मदद से नौशेरा पर तीन बार हमला किया लेकिन उस्मान के फुल फ्रूफ प्लान की वजह से वे नाकामयाब रहे.

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इस दौरान ब्रिगेडियर उस्मान को एक और समस्या का सामना करना पड़ा वो था उनके जवानों का भरोसा जीतना. वो मुस्लिम थे और ब्रिगेड के ज्यादातर जवान हिंदू थे. ऐसी स्थिति में उन्होंने ब्रिगेड के जवानों को आदेश दिया कि जब भी वे एक-दूसरे से मिलेंगे तो जय हिंद बोलेंगे. सेना में जय हिंद की ये परंपरा आज भी कायम है.

एम करियप्पा ने उस्मान को दिया था आदेश

जनवरी 1948 में ले. जनरल के एम करियप्पा ने नौशेरा का दौरा किया और उस्मान से कहा कि वे कोट और झंगड़ पर दोबारा कब्जा करें. उस्मान ने अपने कमांडर को भरोसा दिलाया कि कुछ दिन में कोट पर हमारी फतह होगी. इसके बाद उस्मान ने न सिर्फ कोट पर कब्जा किया बल्कि पाकिस्तान को भारी नुकसान भी पहुंचाया. कोट की लड़ाई में 156 पाकिस्तानी मारे गए और भारत के तरफ से महज 7 जवान शहीद हुए. नौशेरा की लड़ाई में भी आंकड़े कुछ ऐसे ही थे. जिसमें दुश्मन के करीब 2000 सैनिक मारे गए और भारत की ओर से केवल 33 जवानों की शहादत हुई. नौशेरा की जंग ने उस्मान को पूरे देश में मशहूर कर दिया और उन्हें नौशेरा का शेर कहा जाने लगा.

झंगड़ की जंग में शहीद हुए थे उस्मान

इसके बाद तारीख आई 10 मार्च 1948. ब्रिगेडियर उस्मान को आदेश मिला कि झंगड़ इलाके पर फिर से कब्जा किया जाए. जिसके बाद उस्मान अपनी ब्रिगेड को लेकर झंगड़ पहुंच गए. इस दौरान दुश्मन की तरफ से उन पर जर्बदस्त गोलीबारी हुई. इसी गोलीबारी में एक तोप का गोला उस्मान के पास आकर फटा. वे बुरी तरह घायल हो गए. इलाज के दौरान उन्हें बचाया नहीं जा सका. हालांकि उनके सैनिकों ने उसके कुछ ही वक्त के भीतर झंगड़ पर फिर तिरंगा लहरा दिया.

नेहरू ने रिसीव किया था उस्मान का पार्थिव शरीर

दूसरी तरफ ब्रिगेड का हर सैनिक उस्मान के जाने पर आंसू बहा रहा था. पहले उनके पार्थिव शरीर को जम्मू लाया गया. वहां से उसे दिल्ली ले जाया गया. देश के लिए अपनी ज़िंदगी देने वाले इस शख़्स के सम्मान में दिल्ली हवाई अड्डे पर बहुत बड़ी भीड़ जमा हो गई थी. खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उनके पार्थिव शरीर को रिसीव किया. उनके जनाजे में भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन और नेहरू मंत्रिमंडल के करीब-करीब सभी सदस्य मौजूद थे.

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भारत सरकार ने ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान को मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया. ऐसा माना जाता है कि भारत की ओर से आजादी के बाद हुई किसी भी जंग में शहीद होने वाले वे सेना के सबसे बड़े अधिकारी हैं. अगर आप भी ब्रिगेडियर उस्मान को नमन करना चाहते हैं तो हम आपको बता दें कि दिल्ली के जामिया में बटला हाउस के पास ही उनकी कब्र मौजूद है.

चलते-चलते 15 जुलाई को हुई दूसरी ऐतिहासिक घटनाओं पर भी निगाह डाल लेते हैं.

1916 : दुनिया की सबसे बड़ी एयरोस्पेस कंपनी बोइंग (Aerospace Company Boeing) की शुरुआत
1937 : हिंदी के जाने-माने पत्रकार प्रभाष जोशी (Journalist Prabhash Joshi) का जन्म
1955 : प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू (Jawahar Lal Nehru) को भारत रत्न देने का ऐलान
1979 : मोरारजी देसाई (Morarji Desai) ने भारत के प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफा दिया

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