Tokyo Paralympics में स्वर्णिम इतिहास रचने वाले गोल्डन जैवलिन थ्रोअर सुमित अंतिल (Sumit Antil) पर आज पूरा देश गर्व कर रहा है. लेकिन गोल्डन ड्रीम्स को साकार करने की उनकी ये राह इतनी आसान नहीं थी. जिंदगी ने हर मोड़ पर उनकी परीक्षा ली. लेकिन कभी हार ना मानने की आदत और कुछ कर गुजरने की जिद्द ने उन्हें कायमाबी के शिखर पर स्थापित कर दिया. आइए जानते हैं हरियाणा के 'सुनहरे' लाल सुमित अंतिल की जिंदगी से जुड़े कुछ अनसुने किस्से-
सुमित जब 7 साल के थे, तब एयरफोर्स में तैनात उनके पिता की बीमारी से मौत हो गई
योगेश्वर दत्त को अपना Ideal मानने वाले सुमित अंतिल का सपना रेसलर बनने का था
लेकिन 5 जनवरी 2015 को जब सुमित 12वीं क्लास में थे तब एक रोड एक्सीडेंट में उन्हें अपना बायां पैर गंवाना पड़ा
हादसे के बावजूद सुमित कभी उदास नहीं हुए और खेल में कुछ अलग करने की ठानी
इसके बाद दिल्ली में द्रोणाचार्य अवॉर्डी कोच नवल सिंह ने उन्हें जैवलिन थ्रो के गुर सिखाए
सुमित ने साल 2018 में एशियन चैम्पियनशिप में हिस्सा लिया, लेकिन 5वीं रैंक ही हासिल कर सके
लेकिन साल 2019 में वर्ल्ड चैम्पियनशिप में उन्होंने सिल्वर मेडल जीता और पैरालिंपिक्स के लिए क्वालिफाई किया
पहली बार पैरालिंपिक गेम्स में हिस्सा लेने वाले सुमित ने टोक्यो में गोल्ड मेडल जीतकर एक नया इतिहास रच दिया
टोक्यो में सुमित ने 68.55 मीटर का थ्रो कर फेंककर गोल्ड जीतने के साथ ही एक नया वर्ल्ड रिकॉर्ड भी कायम किया
करीब 6 साल पहले सड़क हादसे में अपना एक पैर गंवाने वाले सुमित ने बुलंद हौसलों, मेहनत और जज्बे के दम पर ये मुकाम हासिल किया है. वो कहते हैं ना कि मन के हारे हार है और मन के जीते-जीत.