Kargil Vijay Diwas 2021: बात मई 1999 की है जब कारगिल सेक्टर जो अब लद्दाख में है, उस समय जम्मू कश्मीर में आता था, वहां पर 60 दिनों तक भारत और पाकिस्तान की सेनाएं आमने-सामने थीं. इस जंग में भारतीय सेना ने जब तोलोलिंग पर फिर से कब्जा किया तो जीत निश्चित लगने लगी थी. इस पहाड़ी पर फिर से कब्ज़ा करने में कई रणबांकुरों ने अपनी जान गंवा दी.
आज हम आपको बताएंगे हवलदार यशवीर सिंह तोमर के बारे में जिन्होंने इस चोटी को फिर से हासिल करने में अपनी जान की बाजी लगा दी थी. राजपूताना राइफल्स के हवलदार यशवीर सिंह को मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया था.
तोलोलिंग पर कब्जा आसान नहीं था और कई दिनों तक इस पर कब्जे के लिए युद्ध चला. कारगिल के द्रास सेक्टर में तैनात 18 ग्रेनिडयर्स को तोलोलिंग की चोटी पर भारतीय तिरंगे फहराने का आदेश मिला था. हजारों फीट की ऊंचाई पर बैठे घुसपैठियों को भगाने के लिए मेजर राजेश अधिकारी अपने जवानों को लेकर आगे बढ़े.
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पाकिस्तानी सेना को जैसे ही आहट मिली उन्होंन अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी. इस गोलीबारी में 18 ग्रेनेडियर्स के 25 जवान शहीद हो गए. 2 और 3 जून को पूरी योजना बनाकर फिर से हमला किया गया लेकिन इस बार भी असफलता मिली.
तोलोलिंग को दोबारा हासिल करने की जिम्मेदारी अब 2 राजपूताना राइफल्स पर आ गई थी. राजपूताना राइफल्स की तरफ से फायरिंग शुरू हुई. आखिरी हमले में मेजर विवेक गुप्ता शहीद हो गए थे. मेजर गुप्ता जिस टीम को लीड कर रहे थे कहते हैं उसमें 11 जवान ऐसे थे जिनका सरनेम तोमर था. हवलदार यशवीर सिंह उनमें से ही एक थे. हवलदार यशवीर सिंह तोमर के आखिरी शब्द थे, ‘साहब 11 तोमर जा रहे हैं और 11 जीतकर लौटेंगे.’
12 जून की रात 2:30 बजे यानी 13 जून को पाकिस्तान की तरफ से भारी गोलीबारी जारी थी. भारतीय सैनिकों में तोलोलिंग को जीतने की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. हवलदार यशवीर को पता नहीं क्या सूझा और उन्होंने सारे ग्रेनेड्स इकट्ठा किए. इसके बाद उन्होंने एक साथ 18 ग्रेनेड्स दुश्मन के बंकरों पर दे मारे. हवलदार यशवीर इसमें शहीद हो गए.
जब उनका शव मिला तो उनके एक हाथ में राइफल और एक हाथ में ग्रेनेड था. कारगिल की जंग में हवलदार यशवीर ने जो किया उसे आज तक सबसे बहादुरी वाले एक्शन में गिना जाता है. तोलोलिंग जीती गई और इस पर तिरंगा भी लहराया. 10 तोमर तो वापस आ गए मगर एक हवलदार यशवीर सिंह शहीद होकर भी अमर हो गए.
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