India@75: वो नेता जिन्होंने आजाद भारत को दशा और दिशा दी

Updated : Aug 13, 2021 00:37
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Editorji News Desk

15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश हुकूमत से आजादी पाने के बाद भारत ने शून्य से स्वयं का निर्माण शुरू किया और ये विकास यात्रा अभी भी जारी है. इन सालों के दौरान भारत ने कई बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं और कई को वो हासिल करने की तरफ बढ़ रहा है. एक समय पर छोटी छोटी रियासतों में बंटा भारत राजशाही से चलता था, लेकिन आजादी के बाद देश में लोक राज है और आज की तारीख में देश ने जो भी ख्याति कमाई है उसके दो ही प्रमुख घटक हैं- लोक और राज, यानी इस देश के लोग और देश के लोगों द्वारा चुने गए राजनेता.  
 

भारत में एक से बढ़ कर एक राजनेता हुए हैं जिनकी कार्यकुशलता और प्रसिद्धि ने देश की सीमाओं से बाहर भी डंका बजाया. आज बात ऐसे ही कुछ राजनेताओं की जिन्होंने भारत को बदला. इस कड़ी में पहला नाम है- 

जवाहर लाल नेहरू 

देश आजाद हुआ तो देश की कमान जवाहर लाल नेहरू ने संभाली, वो आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बने और उन्होंने बिना एक क्षण की देरी किए भारत को 'स्वावलंबी भारत' बनाने की दिशा में काम करना शुरू किया. आधुनिक भारत को आकार देने में नेहरू का योगदान बेहद अहम है. उनकी विकास केंद्रित नीतियों के कारण देश में कृषि और उद्योग का एक नया युग शुरु हुआ. उन्होंने अलग अलग क्षेत्रों के लिए विश्व स्तरीय संस्थानों को शुरू करवाया जिन्होंने आधुनिक भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की.  

नेहरू की ही अगुवाई में देश के विकास की रूपरेखा बनाने के लिए योजना आयोग जैसी संस्था बनी, पंचवर्षीय योजना की शुरुआत हुई. विकसित और स्वावलंबी भारत को शक्ल देने के लिए उन्होंने IIT, IIM, AIIMS समेत देश में उच्च शिक्षा संस्थानों की शुरुआत की. सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा की शुरुआत भी नेहरू जी ने ही की. राष्ट्रीय रक्षा अकादमी और परमाणु ऊर्जा आयोग की नींव भी नेहरू ने ही रखी.  भारत के पहले प्रधानमंत्री के तौर पर उन्होंने शिक्षा से लेकर औद्योगीकरण तक, महिलाओं की मुक्ति से लेकर जनजातियों के कल्याण तक... और मानवता, व्यक्तित्व और धर्मनिरपेक्षता पर जोर देने से लेकर गुटनिरपेक्ष दुनिया के अपने दृष्टिकोण तक, नेहरू ने एक दूरदर्शी राजनेता की सभी विशेषताओं को प्रदर्शित किया. उनके नेतृत्व में, भारत एक ऐसे राष्ट्र के रूप में उभरा जिसने 'अनेकता में एकता' को बढ़ावा दिया. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने एक इंटरव्यू में कहा था कि – भारत और पाकिस्तान में विकास और लोकतंत्र की कहानी सिर्फ इसलिए अलग है क्योंकि आजादी के बाद भारत को नेहरू जैसे नेता लीड कर रहे थे.  

जवाहर लाल नेहरू  

# आधुनिक भारत के आर्किटेक्ट  

# विकास पर फोकस, कृषि का आधुनिकिकरण और उद्योगों पर जोर  

# योजना आयोग बनाया, पंचवर्षीय योजना शुरू की  

# IIT, IIM, AIIMS समेत देश में उच्च शिक्षा संस्थानों की शुरुआत  

# सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा की शुरुआत  

# राष्ट्रीय रक्षा अकादमी और परमाणु ऊर्जा आयोग की नींव रखी ) 

 

लाल बहादुर शास्त्री 

27 मई 1964 को जवाहर लाल नेहरू के निधन के बाद लाल बहादुर शास्त्री देश के दूसरे प्रधानमंत्री बने. वो बेहद सादगी से जीवन जीने वाले इंसान थे और उनके प्रधानमंत्री बनने पर देश के अंतिम व्यक्ति को भी ऐसा लगा जैसे उसके बीच का कोई एक ऐसे महत्वपूर्ण पद पर जा पहुंचा हो. देश के गरीबों और वंचितों की शास्त्री जी को इतनी चिंता रहती थी कि रूस के राजनेताओं ने उन्हें 'सुपर कम्युनिस्ट' बुलाना शुरू कर दिया था. शास्त्री जी चेहरे और आचरण से जितने सौम्य थे इरादों से उतने ही मजबूत.   

पाकिस्तान के साथ 1965 के युद्ध में जब तीनों सेना प्रमुखों ने उनसे पूछा कि- प्रधानमंत्री जी, हमारे लिए आपका क्या आदेश है तो शास्त्री जी ने तुरंत कहा कि आप देश की रक्षा कीजिए और मुझे बताइए कि हमें क्या करना है? जय जवान-जय किसान का नारा देकर उन्होंने ना सिर्फ सीमा पर तैनात जवानों का मनोबल ऊंचा किया बल्कि किसानों का आत्मबल भी बढ़ाया.   

 

लाल बहादुर शास्त्री  

 

#  उनके PM बनने से देश के हर आम आदमी को मिला हौसला  

# 'सुपर कम्युनिस्ट'  

#  जय जवान-जय किसान का नारा दिया  

 

इंदिरा गांधी 

अब बात देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की. शास्त्री जी के निधन के बाद इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री बनीं और उनके राज चलाने के अंदाज ने देश की राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया. एक समय पर 'गूंगी गुड़िया' के नाम से पुकारी गईं इंदिरा गांधी ने अपने कार्यकाल के दौरान एक से बढ़ कर एक सख्त फैसले लिए. तत्कालीन राजघरानों के प्रिवी पर्स को समाप्त करने से लेकर बैंकों के राष्ट्रीयकरण तक... अलग बांग्लादेश का गठन करने से लेकर आपातकाल लगाने तक इंदिरा गांधी का हर फैसला अपने आप में मिसाल था. उनकी लोकप्रियता का आलम ये था कि देश की जनता उन्हें भगवान तुल्य मानती थी. साल 1974 में पोखरण परमाणु परीक्षण और 1975 में सिक्किम के भारत में विलय के मौके पर इंदिरा ने साबित कर दिखाया कि उनकी कूटनीति का कोई सानी नहीं है. जब इंदिरा गांधी ने संसद भवन में प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी तो उनके पीछे भगवान बुद्ध की मूर्ति थी जिस पर लिखा था- 'निर्भीक रहो'. ये तो स्पष्ट नहीं है कि उनकी दृढ़ संकल्प शक्ति के पीछे प्रेरणा यही थी या कुछ और लेकिन एक निर्भीक इंसान ही 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' जैसा फैसला ले सकता है. हालांकि यही फैसला बाद में उनकी मौत का कारण भी बना. 

 

इंदिया गांधी  

 

# देश की पहली महिला प्रधानमंत्री  

#  शुरुआती दौर में कहा गया 'गूंगी गुड़िया'  

# सख्त फैसलों के लिए की जाएंगी याद  

#  प्रिवी पर्स को समाप्त करना, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, अलग बांग्लादेश का गठन  

# देश में आपातकाल लगाया  

# कूटनीति का सानी नहीं - 1974 में पोखरण परमाणु परीक्षण और 1975 में सिक्किम का भारत में विलय

जय प्रकाश नारायण

प्रधानमंत्री के रूप में इंदिरा गांधी का लोहा देश ही नहीं दुनिया ने भी माना. उनके राजनीतिक दांव-पेंच इतने सधे हुए और अप्रत्याशित होते थे कि विपक्षी क्या उनकी अपनी पार्टी के नेता भी कई बार भौचक्के रह जाते थे. देश में उनकी तूती बोलती थी लेकिन बावजूद इसके एक आदमी था जो ना केवल लगातार उनको चुनौती दे रहा था बल्कि कभी कभी उन पर इक्कीस भी पड़ता था. इस व्यक्ति का नाम था जय प्रकाश नारायण. 'लोक नायक' की उपाधि प्राप्त और जेपी के नाम से विख्यात जय प्रकाश जी की देश में आजादी की लड़ाई से लेकर साल 1977 तक तमाम जन आंदोलनों में अग्रणी भूमिका रही. आजादी के बाद उन्होंने राजनीतिक रूप से अपनी सक्रियता सीमित कर दी थी लेकिन 1970 के बाद के सालों में उन्होंने पूरी मुखरता के साथ एक बार फिर आम आदमी की आवाज को बल देना शुरू किया. 5 जून 1974 को पटना के गांधी मैदान में की गई उनकी रैली आज भी इतिहास में दर्ज है. इसी रैली में उन्होंने 'सम्पूर्ण क्रांति' का नारा दिया जो आगे चलकर पहले आपातकाल और बाद में इंदिरा सरकार की विदाई का मुख्य कारण बना. उनके इस आंदोलन के बाद ही देश में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी. जेपी के इस आंदोलन से लालू यादव, नीतीश कुमार, मुलायम सिंह यादव, राम विलास पासवान, जार्ज फर्नांडिस, सुशील मोदी समेत कई बड़े नेता देश को मिले. इस क्रांति का प्रभाव ना केवल भारत, बल्कि दुनिया के तमाम छोटे देशों पर भी पड़ा था और जेपी विश्व पटल पर एक नायक के रूप में उभरे.    

 

जय प्रकाश नारायण


\\\ अपने दौर की सबसे मुखर आवाज़
\\\ 'लोकनायक' के नाम से पहचाने जाते थे
\\\ आज़ादी के आंदोलन से लेकर 1977 तक रहे एक्टिव
\\\ हमेशा सत्ता को चेताते और लोगों को जगाते रहे
\\\ इंदिरा के काम से थे नाखुश, 'संपूर्ण क्रांति' का नारा दिया

 

विश्वनाथ प्रताप सिंह


देश में तमाम राजनीतिक उथल पुथल के बाद 2 दिसंबर 1989 को भारत के प्रधानमंत्री बने विश्वनाथ प्रताप सिंह जिन्हें वीपी सिंह के नाम से भी जाना जाता है. यूपी के एक शाही राजपूत परिवार से आने वाले वीपी सिंह ने बोफोर्स तोप दलाली के मुद्दे राजीव सरकार में मंत्री पद छोड़ दिया था और देश में उनकी क्लीन मैन की इमेज बन गई थी. उस दौर में नारा उछला था कि 'राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है' लेकिन वीपी सिंह के एक फैसले ने ना केवल उनकी बल्कि भारतीय राजनीति की तकदीर को भी हमेशा के लिए बदल दिया. दरअसल 20 दिसंबर 1978 को मोरारजी देसाई की सरकार ने बिहार के मधेपुरा से सांसद बीपी मंडल की अध्यक्षता में एक पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया था जिसे मंडल आयोग कहा गया. 1980 में इंदिरा सरकार के दौरान मंडल आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी जिसमें पिछड़े वर्ग के लोगों के लिये सरकारी नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण की सिफारिश की गई साथ ही कहा गया कि शिक्षण संस्थानों में दाखिले के लिये ओबीसी वर्ग के छात्र-छात्राओं के लिये 27% आरक्षण लागू किया जाए. मंडल की ये रिपोर्ट इंदिरा और राजीव गांधी के राज में धूल फांकती रही लेकिन 7 अगस्त 1990 को वीपी सिंह ने इसे लागू कर दिया. यही से वीपी अगड़ों के निशाने पर आ गए. हालात इतने बिगड़े के बीजेपी और वाम दलों के सहयोग से सरकार चला रहे वीपी से बीजेपी ने समर्थन वापस ले लिया और सरकार गिर गई. अगड़ों को लपकने और मंडल का काट निकालने के लिए बीजेपी ने 'कमंडल' को सहारा बनाया और उसकी इस राजनीति ने आगे चल कर हिंदुत्व की राजनीति की शक्ल ली.  


विश्वनाथ प्रताप सिंह


\\\ भारी राजनीतिक उथल-पुथल के बीच संभाली देश की कमान
\\\ भ्रष्टाचार से नाराज होकर राजीव सरकार में मंत्रिपद छोड़ा
\\\ प्रधानमंत्री बने तो 'मंडल आयोग' की सिफारिशों को लागू किया
\\\ फैसले ने उन्हें पिछड़ों के लिए हीरो तो अगड़ों के लिए विलेन बनाया
\\\ फैसले के बाद बने हालातों के चलते गंवानी पड़ी सत्ता
 

अटल बिहारी वाजपेयी


देश में दक्षिणपंथी विचारधारा को सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाने का श्रेय अगर किसी को जाता है तो वो हैं अटल बिहारी वाजपेयी. हालांकि वाजपेयी को इस उपलब्धि में लालकृष्ण आडवाणी का पूरा साथ मिला और शायद आडवाणी के बिना ये मुकाम हासिल भी नहीं हो पाता. 90 का दौर देश में राजनीतिक रूप से काफी उथल-पुथल भरा रहा. जहां एक तरफ मंडल की विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए देश में दलित केंद्रित राजनीति की शुरुआत हुई तो वहीं बीजेपी भगवान राम के नाम को प्रमुखता से आगे कर हिंदुत्व के रथ पर सवार हो गई. 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में जो कुछ हुआ उसने बीजेपी को एक नई गति दी और इसी गति  की बदौलत वो सत्ता में आई और वाजपेयी तीन बार देश के प्रधानमंत्री बने. पहले 13 दिन तक, फिर 13 महीने तक और उसके बाद 1999 से 2004 तक. वो पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री थे जिन्होंने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया. वाजपेयी का कार्यकाल कई मायनों में अहम था. जहां एक तरफ उन्होंने देश में गठबंधन सरकार को सहजता से चला पाने की नीति को स्थापित कर के दिखाया वहीं कई ऐसी योजनाएं भी लागू की जिन्होंने देश को एक नई दिशा दी. स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क परियोजना, नदियों का एकीकरण और सर्व शिक्षा अभियान सरीखी योजनाएं वाजपेयी कार्यकाल में शुरू हुईं. उन्होंने पोखरण परमाणु परीक्षण और लाहौर बस सेवा के जरिए विदेश नीति को नए आयाम देने के प्रयास किए. लेकिन इस से इतर करगिल युद्ध, कंधार हाईजैक, संसद परिसर पर हमला और गुजरात दंगे जैसे कुछ ऐसे दाग भी हैं जो आज तक ना केवल वाजपेयी बल्कि बीजेपी के कुछ दूसरे नेताओं पर भी सवाल उठाते हैं. देश की राजनीति में ये मुद्दे भले ही अब थोड़ा पीछे सरक गए हों लेकिन ज़िंदा आज भी हैं.

 
अटल बिहारी वाजपेयी


\\\ संघ से जुड़ा वो नेता जिसने BJP को सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाया
\\\ 'मंडल' के खिलाफ बीजेपी ने शुरू की 'कमंडल' की राजनीति
\\\ अटल-आडवाणी की जोड़ी ने 'राम' के नाम पर आगे बढ़ाई राजनीतिक यात्रा
\\\ अटल ऐसे पहले गैर कांग्रेसी पीएम थे जिन्होंने पांच साल तक सरकार चलाई    

 

पेरियार

यूं तो भारत की राजनीति में उत्तर भारतीय राजनेताओं का दबदबा रहा है लेकिन दक्षिण भारत में भी कई ऐसे बड़े नेता हुए हैं जिनकी धमक दिल्ली तक रही है. ऐसा ही एक नाम हैं ई. वी. रामास्वामी जिन्हें दुनिया पेरियार के नाम से जानती है. पेरियार का अर्थ होता है महान. एक समय पर दलित और पिछड़ी जातियों को समाज में बराबरी का हक दिलाने के लिए आत्मसम्मान आंदोलन शुरू करने वाले पेरियार ने दक्षिण में ब्राह्मणों के वर्चस्व को चुनौती दी. इसी कड़ी में पेरियार ने 1940 में द्रविड़ कड़गम की स्थापना की और यहां उन्हें साथ मिला सीएन अन्नादुरई का. अन्नादुरई ऐसे पहले राजनेता थे जिन्होंने दक्षिण की राजनीति में फिल्मों सितारों की एंट्री करवाई. पेरियार से अलग होकर अन्नादुरई ने 1956 में ‘द्रविड़ मुनेत्र कड़गम’ नाम से पार्टी बनाई और इसमें एनएस कृष्णन, एमआर राधा, शिवाजी गणेशन, एसएस राजेंद्रन, मारुदुर गोपालन रामचन्द्रन (MGR) और एम करुणानिधि जैसे सितारों को जोड़ा. अन्नादुरई के बाद पार्टी की कमान करुणानिधि के हाथ आई और आज ये पार्टी ना केवल तमिलनाडु की सत्ता में है बल्कि भूतकाल में इसके बनाए रास्ते पर ही आज की दक्षिण भारतीय राजनीति आगे बढ़ रही है


पेरियार

\\\ असल नाम ई. वी. रामास्वामी था
\\\ लोग प्यार से 'पेरियार' कहते थे जिसका अर्थ होता है- महान
\\\ दलित-पिछड़ों को बराबरी का हक़ दिलाने के लिए संघर्ष किया
\\\ सीएन अन्नादुरई भी आये पेरियार के साथ, बाद में हुए अलग
\\\ सीएन अन्नादुरई ने 1956 में DMK पार्टी बनाई
\\\ DMK से जुड़े थे कई बड़े नेता, फिल्मी सितारे भी राजनीति में आए
\\\ अन्नादुरई के बाद पार्टी की कमान करुणानिधि के हाथ आई

Independence Day15th August

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