Guru Dutt, The Genius & his Classics:
रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई
तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई
डरता हूं कहीं खुश्क न हो जाए समंदर
राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई…
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है...
कैफी आजमी ने ये शेर अपने दोस्त गुरु दत्त के लिए लिखा था, अक्टूबर 1964 में महज 39 साल की उम्र में उनकी हैरान कर देने वाली मौत या ‘खुदकुशी’ के बाद.
गुरु दत्त यानि हिंदी सिनेमा का वो जीनियस डायरेक्टर जिसने हिंदुस्तान में फिल्म निर्देशन को एक नई बुलंदी दी. सत्यजीत रे और दादा साहब फाल्के के बाद गुरु दत्त वो नाम है जिसने अपने छोटे से करियर में सफलता के बड़े मकाम हासिल किए, भारतीय सिनेमा को इंटरनेशनल प्लैटफॉर्म तक पहुंचाया. लेकिन फिर खुद ही सबकुछ खत्म भी कर दिया. मोहब्बत में नाकामी, परिवार का टूटना और बच्चों से जुदाई उनसे नहीं झेली गई और वो डिप्रेशन में चले गए. महज 39 साल की उम्र में इस महान डायरेक्टर ने शराब और नींद की गोलियों का ऐसा जानलेवा कॉकटेल बनाया जिसने उनकी जिंदगी के सीन को अचानक ‘कट’ कर दिया.
गुरु दत्त के शाहकार
‘प्यासा’ … ‘कागज के फूल’ … ‘साहेब बीवी और गुलाम’ … ‘चौदहवीं का चांद’ … ‘मिस्टर एंड मिसेज 55’ … ‘बाजी’ ... ये उनकी कुछ बेहतरीन फिल्में हैं, जिन्होंने देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी भारतीय फिल्मों की पैठ बढ़ाई.
कल्ट फिल्म ‘प्यासा’
1957 में आई प्यासा एक कल्ट फिल्म है. ये एक ऐसे कवि की कहानी है जिसे जीते जी प्यार और सम्मान नहीं मिला, सिर्फ रुसवाई मिली, अपनों से भी और गैरों से भी. पर जब उसकी झूठी मौत की खबर के बाद उसकी रचना छपी तो सबने खूब प्यार लुटाया. लेकिन हर तरफ से तिरस्कार और दुत्कार झेलने वाले कवि विजय ने उस झूठे प्यार और सम्मान को नकार दिया. प्यासा टाइम्स मैगजीन की दुनिया की 100 बेहतरीन फिल्मों में शुमार है.
क्लासिक ‘कागज़ के फूल’
गुरु दत्त एक जीनियस फिल्म डायरेक्टर थे. 1959 में आई उनकी सबसे बड़ी और दिल के सबसे करीब फिल्म ‘कागज के फूल’ एक टाइमलेस शाहकार है, क्लासिक है. वक्त से आगे की ये फिल्म तब फ्लॉप साबित हुई, इसने गुरु दत्त को इतना तोड़ दिया था कि उन्होंने फिल्मों का डायरेक्शन ही छोड़ दिया.
फिल्मों के लिए उनका जुनून और पैशन उनके हर फ्रेम में झलकता था. उनकी कहानियों में जिंदगी का अक्स इस कदर नुमायां था कि सीधे दिल में उतर जाता था. गुरु की फिल्में एक खूबसूरत कविता की तरह दर्शकों के ज़ेहन में उतरती थीं और फिर वहीं ठहर जाती थीं. तभी तो वो 50 के दशक में जितनी रेलिवेंट थीं, उतनी ही 2021 में भी हैं.
कोंकणी थे गुरु दत्त
गुर दत्त बंगाली नहीं थे, उनका असली नाम वसन्त कुमार शिवशंकर पादुकोण था, वो कोंकणी थे. 9 जुलाई, 1925 को उनका जन्म मैंगलोर में हुआ था, लेकिन बचपन कलकत्ता में बीता. बचपन से ही वो धुनी थे, जो करते थे उसी में लगे रहते थे. फिल्म और संगीत में काफी रुची थी.
सिनेमा का था ‘नशा’
गुरु दत्त सिनेमा में ही डूबे रहते थे, या टूं कहें कि फिल्मों का उन्हें नशा था. इसकी शिद्दत का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि प्यासा का एक सीन फाइनल करने के लिए उन्होंने 104 रिटेक लिए. वो भी तब जब वो सीन में खुद थे. फिल्म के सिनेमैटोग्राफर वी.के. मूर्ती ने अपने एक इंटरव्यू में ये बात बताई थी.
प्रभात स्टूडियो से शुरुआत
गुरु दत्त की पहली हिट फिल्म थी बाज़ी, भारत की पहली क्राइम थ्रिलर, जो उन्होंने अपने सबसे अजीज दोस्त देव आनंद के साथ बनाई थी. दोनों की दोस्ती की कहानी भी मिसाल है. 1944 में गुरु दत्त का परिवार कलकत्ता से बंबई आ गया था, उनके अंकल ने वसंत यानि गुरु दत्त को 'प्रभात फिल्म कंपनी' में नौकरी पर लगा दिया, 3 साल का क़न्ट्रैक्ट था, यहीं उन्होंने फिल्म मेकिंग की बारीकियां सीखीं.
देव आनंद से दोस्ती
गुरु दत्त की देव आनंद से पहली मुलाकात पुणे के प्रभात स्टूडियो में हुई थी, वजह था उनका धोबी जिसने गलती से दोनों की शर्ट बदल दी थी. स्टूडियो पहुंचे गुरु को देव आनंद की कमीज़ कुछ पहचानी हुई सी लगी तो उन्होंने छूटते ही पूछा, "ये कमीज़ आपने कहाँ से ख़रीदी?" देव आनंद थोड़ा सकपकाए लेकिन बोले, "ये कमीज़ मेरे धोबी ने किसी की सालगिरह पर पहनने के लिए दी है. लेकिन जनाब आप भी बताएं कि आपने अपनी कमीज़ कहाँ से ख़रीदी?" गुरु दत्त ने शरारती अंदाज़ में जवाब दिया कि ये कमीज़ उन्होंने कहीं से चुराई है. फिर ठहाके लगे और ये ठहाके ता उम्र चलते रहे.
बीयर पीते हुए किया वो वादा
एक दिन बियर पीते हुए गुरु दत्त ने वादा किया कि "देव अगर कभी मैं डायरेक्टर बनता हूं तो तुम मेरे पहले हीरो होगे." तो देव ने भी वादा किया "और तुम मेरे पहले डायरेक्टर होगे अगर मैंने कोई फिल्म प्रोड्युस की तो". दोनों ने अपना वादा निभाया भी. देव आनंद के प्रोडक्शन हाउस नवकेतन की पहली हिट फिल्म थी गुरु दत्त की 'बाजी'. तो वहीं गुरु ने भी अपनी सुपरहिट फिल्म 'सीआईडी' में देवानंद को बतौर अभिनेता काम दिया.
वहीदा से मोहब्बत
गुरुदत्त की जिंदगी में वहीदा रहमान एक बेहद अहम चैप्टर है, इस नाम ने उनकी जिंदगी को, उनकी फिल्म मेकिंग को जितना संजोया उसी शिद्दत से उसे बिखेर भी दिया. कहते हैं गुरु दत्त का शाहकार ‘कागज़ के फूल’ उनकी और वहीदा की लव स्टोरी पर बेस्ड है, उनकी की कहानी है. एक तेलुगु फिल्म की फोटो में गुरु दत्त ने वहीदा को देखा और बस देखते ही रह गए, उन्हें अपनी फिल्म CID में लीड रोल दिया. फिर तो दोनों ने एक साथ कई यादगार और एतिहासिक फिल्में दीं... प्यासा, कागज के फूल, चौदहवीं का चांद इनमें शामिल हैं.
लेकिन वहीदा से उनका प्यार उनकी शादीशुदा जिंदगी में इस कदर उथल पुथल लाया कि उन लहरों में वो खो गए. हर रोज पत्नी गीता से झगड़े होते, उन्होंने खुद को शराब में डुबो लिया. पत्नी और सिंगर गीता दत्त बच्चों के साथ उन्हें छोड़ कर चली गईं. वहीदा से भी झगड़ा हो गया, वो भी चली गईं. ना प्यार मिला ना परिवार. कहते हैं पत्नी गीता के कड़े रुख से गुस्साए गुरु दत्त ने अपना पाली हिल का बंगला तक तुड़वा दिया. बच्चों से अलग होकर वो डिप्रेशन में चले गए... और महज 39 साल की उम्र में उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया.
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है...