लगातार 3 चुनाव हारने वाले जितिन BJP में क्यों? ब्राह्मण वोट या 'परसेप्शन' का खेल !

Updated : Jun 10, 2021 19:07
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Editorji News Desk

जितिन प्रसाद (Jitin Prasada) तीसरी पीढ़ी के कांग्रेसी रहे हैं, पिता जितेंद्र प्रसाद कांग्रेस के बड़े नेता थे और केंद्रीय मंत्री भी रह चुके थे, जबकि दादा ज्योति प्रसाद कांग्रेस के विधायक थे. 2014 के बाद से लगातार सारे चुनाव बुरी तरह हारने वाले जितिन प्रसाद की जमीनी पकड़ लगातार कमजोर होती दिखी है, बावजूद इसके जोर शोर के साथ बीजेपी में उनका स्वागत हुआ.

अमित शाह (Amit Shah) और नड्डा से मुलाकात की, फिर बड़े केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल (Piyush Goyal) ने दिल्ली हेडक्वार्टर में पार्टी ज्वाइन कराई. यूपी में कांग्रेस की हालत से सब वाकिफ हैं, पार्टी 1989 के बाद से पावर से बाहर है और प्रियंका के कमान संभालने के बावजूद हालात सुधरते नजर नहीं आ रहे.

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लंबे वक्त से जितिन दूसरी पॉलिटिकल राह की तलाश में थे, 2019 के चुनाव से पहले ही उनकी बीजेपी में जाने की जोर शोर से अटकलें थीं, लेकिन अंतिम वक्त में राहुल-प्रियंका ने उन्हें रोक लिया.

जितिन का भाजपा में आना दोनों में से किसके लिए कैसे और कितना फायदेमंद है इसपर करेंगे बात, लेकिन पहले देखते हैं जितिन प्रसाद का परिचय. 

कौन हैं जितिन प्रसाद ? (Who is Jitin Prasada)

1. उम्र 48 साल, उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में पैदा हुए.

2. दादा Cong के विधायक थे तो पापा जितेंद्र प्रसाद पूर्व केंद्रीय मंत्री और पीएम के सलाहकार.

3. मशहूर दून स्कूल से पढ़ाई की, SRCC से ग्रैजुएशन और फिर MBA. 

4. साल 2001 में यूथ कांग्रेस से राजनीतिक करियर की शुरुआत. 

5. 2004 में शाहजहांपुर से पहला लोकसभा चुनाव जीते. 

6. 2008 में ही महज 34 साल की उम्र में मनमोहन सरकार में मंत्री बन गए. 

7. UPA सरकार में इस्पात मंत्रालय, सड़क परिवहन मंत्रालय, पेट्रोलियम मंत्रालय और मानव संसाधन विकास मंत्रालय में मंत्री रहे. 

डूबती नैया और सियासी फिक्र !

2014: अपनी धौरहरा सीट से लोकसभा चुनाव  बुरी तरह हारे, चौथे नंबर पर रहे. 

2017: कांग्रेस ने शाहजहांपुर की तिलहर सीट से विधानसभा चुनाव टिकट दिया, लेकिन यहां से भी हार गए.

2019: एक बार फिर लोकसभा चुनाव भी बुरी हार मिली. 

लगातार इतनी हार के बाद यूपी कांग्रेस में कम होने लगा रुतबा, तो जाहिर है पार्टी से नाराजगी भी बढ़ने लगी. 

जितिन प्रसाद - अगर लोगों के काम नहीं आ सकूं, उनके लिए काम न कर सकूं तो राजनीति में रहने का क्या फायदा... 

खिसकती जमीन और बगावती सुर 

2019: लोकसभा चुनाव से ऐन पहले बीजेपी में शामिल होने की काफी तेज थीं अटकलें, खुद उन्होंने भी इससे इनकार नहीं किया था.  

2020: सोनिया गांधी को चिट्ठी लिख कर पार्टी में सुधार की मांग करने वाले पार्टी के 23 नेताओं में थे शामिल. 

2021: बंगाल चुनाव के प्रभारी बने, अधीर रंजन चौधरी पर बोला हमला. 

खिसकती साख वाले जितिन को BJP ने क्यों लिया ? 

1. पॉलिटिकल परसेप्शन 

अब सारा खेल परसेप्शन का है, सरकार चलाने से लेकर चुनाव तक में ये साफ तौर से देखा जा रहा है. बीते कुछ चुनावों से बीजेपी (BJP) और संघ की चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा रहा है पॉलिटिकल पोचिंग यानि विपक्षी दलों के नेताओं को चुनाव से पहले अपने दल में लाकर हलचल बनाना. हाल के बंगाल, असम, कर्नाटक, गोवा जैसे चुनावों में हमने इसकी बानगी खूब देखी है. 

यूपी में बीजेपी को अपनी सरकार का परसेप्शन बेहतर करने की खासी जरूरत भी है. विकास से लेकर कोरोना मैनेजमेंट, दोनों में जो योगी सरकार का हाल रहा है उसका ही नतीजा पंचायत चुनाव में नजर आया. ठोक दो नीति ने भी काफी सुर्खियां बनाईं.

हाल ये है कि संघ से लेकर आलाकमान तक सब परेशान हैं और लंबी लंबी बैठकें कर चुके हैं. लिहाजा जितिन भले जमीन तौर पर पार्टी को कोई बड़ा फायदा ना पहुंचा सकें लेकिन परसेप्शन के लिए बड़े फायदेमंद साबित हो सकते हैं.

तीन पीढ़ी का कांग्रेसी, पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कांग्रेस छोड़ी और बीजेपी को इकलौती नेशनल पार्टी बताया और देखते ही देखते सोशल मीडिया पर माहौल बन गया. टॉप ट्रेंड करने लगी खबर, फिर दूसरे कांग्रेसी नेताओं की भी बातें होने लगीं. नरेटिव बदलने की कोशिश काम करती दिखी. 

2. ब्राह्मण वोटों की खातिर !

ये भी कहा जा रहा है कि जितिन को ब्राह्मण वोटों के चलते बीजेपी में लाया गया. दरअसल यूपी में योगी के सीएम बनने के बाद से ही ब्राह्मण नाराज हैं और योगी सरकार (Yogi Government) पर ब्राह्मण विरोधी होने के आरोप लगते रहे हैं. बीते कुछ दिनों से जितिन भी अपनी पोजिशनिंग ब्राह्मण नेता के तौर पर करने में जुटे थे, ब्राह्मण चेतना परिषद जैसे ट्विटर हैंडल तो यही कहते हैं.

हालांकि जमीनी सच्चाई ये भी है कि यूपी सरकार में डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा और मोदी के करीबी पूर्व IAS एके शर्मा मजबूत हैं, कुल 9 ब्राह्मण मंत्री सरकार में हैं तो ब्यूरोक्रेसी में भी ब्राह्मण अहम पदों पर तैनात हैं. 

खैर, जितिन प्रसाद (Jitin Prasada) के आने से भाजपा का कमल और कितना खिलता है तो कांग्रेस का हाथ कितना कमजोर होता है ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा. 

यह भी पढ़ें | कांग्रेस से एक और 'युवा तुर्क' की विदाई, यूपी के बड़े नेता जितिन प्रसाद ने थामा बीजेपी का दामन

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