केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में ऑक्सीजन के प्रोडक्शन और (Oxygen Audit) वितरण को लेकर एक हलफनामा दाखिल किया है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस एफिडेविट में सुप्रीम कोर्ट की ओर से बनाई गई 12 सदस्यीय टास्क फोर्स (Task Force) की सिफारिशें हैं. हालांकि इसके जिस हिस्से को लेकर सबसे ज्यादा विवाद है वो है दिल्ली के ऑक्सीजन ऑडिट के लिए बनी कमेटी कि अंतरिम रिपोर्ट. दरअसल 6 मई को ही कोर्ट ने इसके लिए एक कमेटी का गठन किया था, इसमें एम्स निदेशक रणदीप गुलेरिया, मैक्स हेल्थकेयर के संदीप बुद्धिराजा के अलावा दूसरे सीनियर आईएस अफसर थे. रिपोर्ट का मानना है कि कमेटी को पेट्रोलियम एंड ऑक्सीजन ने बताया कि दिल्ली के पास एडिश्नल ऑक्सीजन सप्लाई थी और हॉस्पिटल बेड के हिसाब से दिल्ली को 289 मीट्रिक टन ऑक्सीजन ही चाहिए थी, लेकिन उसने 1140 मीट्रिक टन की मांग की. हालांकि इस रिपोर्ट में कई विरोधाभास भी हैं जैसे
-जब ऑक्सीजन की मांग कम थी तो कमेटी ने बाद में इसे 700 से घटा कर 500 और फिर 400 मीट्रिक टन क्यों किया ?
-सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि हॉस्पिटल बेड कैपेसिटी फॉर्मूले से ऑक्सीजन की डिमांग का आकलन सही नहीं
- हालांकि अंतरिम रिपोर्ट में उसी पैमाने को ऑक्सीजन का आधार बनाया गया है
- दिल्ली के अस्पतालों का आंकड़ा भी इस रिपोर्ट में नहीं है
-अगर ऑक्सीजन पर्याप्त थी तो अस्पताल रोज़ HC में SOS अर्जी क्यों लगा रहे थे
-ऑक्सीजन सप्लाई अगर पर्याप्त थी तो बिना ऑक्सीजन कई लोगों की मौत कैसे हो गई ?
जाहिर है इस पर दिल्ली सरकार ने आपत्तियां की है,
वहीं कमेटी के सदस्य डॉ संदी बुद्धिराजा की चिट्ठी का भी जिक्र किया गया है जिसके मुताबिक
-इससे जानकारी मिलती है कि कमेटी ने जिस फॉर्मूले के आधार पर हर अस्पताल की ऑक्सीजन की मांग की
उसमें और असल खपत में अंतर था
- 214 अस्पतालों की ऑक्सीजन खपत 490 मीट्रिक टन के करीब थी
-इसके बाद कमेटी ने दिल्ली को रोज 500 मीट्रिक टन ऑक्सीजन देने की सिफारिश की