rosa parks and her life story - Women's Day: जब एक महिला ने बस में उतरने से कर दिया था इनकार | Editorji Hindi
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Women's Day: जब एक महिला की 'ना' से शुरू हुआ सिविल अधिकार आंदोलन

Mar 08, 2021 01:09 IST | By Editorji News Desk


साल-18 अप्रैल 2012
जगह- ड्रेटॉयट का हेनरी फोर्ड म्यूज़ियम

जिस बस की सीट पर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा बैठे थे..उस सीट से अमेरिका का एक नया इतिहास शुरू हुआ था, नागरिक सिविल अधिकारों का इतिहास..एफ्रो अमेरिकी
समुदाय की लड़ाई में वैसे तो कई जाने-अनजाने चेहरे शामिल हुए, लेकिन उनमें एक महिला की एक ना..यानि एक इनकार ने आंदोलन को टर्निंग प्वाइंट दे दिया. कहते हैं मोहनदास कर्मचंद गांधी को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के महात्मा गांधी बनाने में उनके साथ दक्षिण अफ्रीका में घटी ट्रेन की एक घटना है खासा महत्व रखती है, जिसमें उनके पास टिकट होने के बावजूद उन्हें ट्रेन से निकाल बाहर फेंक दिया गया.. था लेकिन क्या आप जानते हैं कि ऐसा वाक्या 1956 में रोज़ा पार्क्स नाम की एक एफ्रो अफ्रीकन महिला के साथ भी हुआ था..

बात पचास के दशक की उन दिनों की है जब अमेरिका में संस्थानिक रूप से अश्वेतों के साथ सार्वजनिक जीवन में भेदभाव होता था...अलबामा में बतौर दर्जी काम करने वाली रोजा पार्क्स 1955 में एक दिन काम की जगह से घर जाने के लिए ट्रांसपोर्ट की बस में सवार हुईं
श्वेतों के लिए रिजर्व्ड शुरुआती दस सीटें छोड़कर वो पीछे की एक सीट पर बैठ गईं..इस बीच में बाकी सीटें भर गईं थी और एक श्वेत आदमी बस के बस में चढ़ने पर ड्राइवर ने रोजा से सीट छोड़ने को कहा...रोजा ने साफ इनकार कर दिया , जिसके बाद उसे कानून तोड़ने के लिए
कानून तोड़ने के लिए उन्हें तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया और और साथ ही उन्हें 10 डॉलर जुर्माना भी देना पड़ा..इस घटना के 381 दिन तक अश्वेतों ने सार्वजनिक बसों का बहिष्कार किया, मार्टिन लूथर किंग की अगुवाई में सविनय अवज्ञा आंदोलन ने जोर पकड़ लिया...लाखों लोगों का संघर्ष रंग लाया और 1956 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि एफ्रो अमेरिकी अश्वेत नागरिक नगर निगम की किसी भी बस में बैठ सकते हैं... इस घटना को इस घटना को मोंटगोमरी बस की घटना के नाम से याद किया जाता है.. अमेरिका में नागरिक अधिकार आंदोलन का असर 1964 में देखने को मिला...जब कांग्रेस ने सिविल राइट एक्स पास कर दिया, इस कानून के तहत अमेरिका में "जाति, रंग, धर्म, लिंग या राष्ट्रीय मूल" पर आधारित भेदभाव पर प्रतिबंध लगाया गया. ..हालांकि ये सब इतना आसान भी नहीं रहा..बस वाली घटना के बाद पार्क्स को कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा..उनकी नौकरी चली गई और उन्हें पति के साथ शहर छोड़ कर ड्रेटॉयट जाना पड़ा. जहां नागरिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले जॉन कॉन्यर ने उन्हें 1965 में अपने दफ्तर में नौकरी दे दी...रिटायरमेंट तक पार्क्स वहीं काम करती रहीं...कहा जाता है कि आखिरी दिनों में पार्क्स को पैसों की तंगी भी झेलनी पड़ी थी. पार्क्स को 1996 में राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के कार्यकाल में प्रेसिडेंशियल मेडल आफ फ्रीडम से सम्मानित किया गया. 1997 में उन्हें अमेरिकी संसद का सबसे बड़ा सम्मान कांग्रेश्नल गोल्ड मेडल दिया गया. 24 अक्तूबर 2005 को उनका देहांत हो गया. पार्क्स ने दो किताबें भी लिखी थी "रोजा पार्क्स: माई स्टोरी," और 1992 में "क्विट स्ट्रेंथ: द फेथ, द होप एंड द हार्ट ऑफ ए वुमन हू चेंजेड ए नेशन पार्क्स ने जो कुछ उस दिन उस बस में किया...उसने अमेरिकी समाज में अश्वेतों के लिए समान अधिकारों की संवैधानिक राह खोज निकाली थी...बकौल बराक ओबामा
'' मैंने उस सीट पर बैठ कर उस साहत और शक्ति के बारे में सोचा जो हमने कुछ साल पहले देखी और जो हम बदलते समाज के साथ किसी ना किसी रूर में देखते आए हैं. कई बार ऐसे
लोगों का जिक्र इतिहास की किताबों में नहीं होता,लेकिन वे हममें से ही एक ही होके हैं और मौका पड़ने पर अपने आत्म सम्मान के लिए लड़े.
रोज़ा पार्क्स ऐसी ही शख्सियत थीं.

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