Know the reason behind Asafoetida being so expensive - क्या आपने कभी सोचा है आखिर क्यों इतनी महंगी आती है हींग? | Editorji Hindi
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क्या आपने कभी सोचा है आखिर क्यों इतनी महंगी आती है हींग?

Apr 15, 2021 12:33 IST | By Editorji News Desk

हल्दी, नमक ,मिर्च, मसाले सब परफेक्ट लेकिन फिर भी खाने में वो स्वाद नहीं आ रहा.. कुछ तो भूल रही हैं.. लेकिन क्या... अरे हींग का तड़का.. होता है ना ऐसा कई बार. अगर खाने में हींग (Hing) का तड़का ना हो तो कुछ मिसिंग मिसिंग सा लगता है. वो खुशबू, वो स्वाद जिसकी हमें आदत हो गयी है.

हींग (Asafoetida) सिर्फ स्वाद ही नहीं सेहत के लिहाज से भी काफी फायदेमंद होती है लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ये हींग आखिर इतनी महंगी क्यों मिलती है. तो सबसे पहले तो आपको ये बता दें कि हींग भारत में भले ही पैदा ना होती हो लेकिन भारत में इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल ज़रूर होता है. एक अनुमान के मुताबिक दुनिया में पैदा होने वाले हींग का 40 फ़ीसदी भारत में इस्तेमाल होता है.

कहां से आती है हींग

भारत में इस्तेमाल होने वाली हींग ईरान, अफ़ग़ानिस्तान और उज़्बेकिस्तान जैसे देशों से आती है. कुछ व्यापारी इसे कज़ाख़स्तान से भी मंगवाते हैं. अफ़ग़ानिस्तान से आने वाली हींग की मांग सबसे ज़्यादा है.

इतनी महंगी क्यों है हींग?

हींग का पौधा गाजर और मूली के पौधों की कैटेगरी में आता है. इसका प्रोडक्शन ठंडे और ड्राई एन्वॉयरन्मेंट में सबसे अच्छा होता है. हींग को उगने के लिए एक जैसा मौसम चाहिए होता है अगर मौसम में बदलाव आ जाए तो इसका पौधा बढ़ नहीं पाता जिसके कारण भारत में इसकी खेती करना बहुत मुश्किल है. पूरी दुनिया में हींग की क़रीब 130 किस्में हैं. इनमें से कुछ किस्में पंजाब, कश्मीर, लद्दाख और हिमाचल प्रदेश में उपजाई जाती है लेकिन इसकी मुख्य किस्म फेरुला एसाफोइटीडा भारत में नहीं पाई जाती है.

हींग का प्रोडक्शन एक लम्बा और टाइम टेकिंग प्रोसेस है बीज बोने के करीब चार से पांच साल बाद पौंधे से उपज निकलती है. हींग फेरुला एसाफोइटीडा के जड़ से निकाले गए रस से तैयार किया जाता है लेकिन यह इतना आसान नहीं. एक बार जब जड़ों से रस निकाल लिया जाता है तब हींग बनने की प्रक्रिया शुरू होती है.

स्पाइसेस बोर्ड की वेबसाइट के मुताबिक दो तरह के हींग होते हैं- काबुली सफ़ेद और हींग लाल. सफ़ेद हींग पानी में घुल जाता है जबकि लाल या काला हींग तेल में घुलता है.

कच्चे हींग की स्मेल बहुत तीखी होती है इसलिए उसे खाने लायक नहीं माना जाता. खाने लायक गोंद और स्टार्च को मिलाकर उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में तैयार किया जाता है. व्यापारियों का कहना है कि हींग की क़ीमत इस बात पर निर्भर करती है कि उसमें क्या मिलाया गया है. भारत में शुद्ध हींग की क़ीमत अभी क़रीब 35 से 40 हज़ार रुपये है.

भारत कैसे पहुंचा हींग?

कुछ लोगों का कहना है कि हींग मुग़ल काल के दौरान भारत आया था क्योंकि ये ईरान और अफ़ग़ानिस्तान में होता है. लेकिन दस्तावेजों से यह पता चलता है कि हींग मुग़लों के आने से पहले से ही भारत में इस्तेमाल होता रहा है. संस्कृत में इसे हींगू के नाम से जाना जाता है

आयुर्वेद में हींग की अहमियत

आयुर्वेद में हींग को लेकर कई उल्लेख मिलते हैं. अष्टांगहृदय में वाग्भट्ट लिखते हैं, "हिंगु वातकफानाह शूलघ्नं पित्त कोपनम्‌. कटुपाकरसं रुच्यं दीपनं पाचनं लघु.."

इसका मतलब यह हुआ कि हींग शरीर में वात और कफ को ठीक करता है लेकिन यह शरीर में पित्त के स्तर को बढ़ाता है. यह गर्म होता है और भूख को बढ़ाता है. यह स्वाद बढ़ाने वाला है. अगर किसी को स्वाद नहीं मिल रहा है तो उसे पानी में मिलाकर हींग दें.

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