हाइलाइट्स

  • 14 जनवरी 1761 में हुई थी पानीपत की तीसरी जंग
  • मराठे के बेहद बहादुर सेनापति सदाशिव राव भाऊ की हुई थी हार
  • अहमद शाह अब्दाली को यूं ही नहीं मिली थी मराठों पर जीत
  • अब्दाली ने भी की थी मराठों के पराक्रम की जमकर प्रशंसा

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Third Battle of Panipat: सदाशिव राव की एक 'गलती' से मराठे हार गए थे पानीपत की जंग | Jharokha 4 August

आज की तारीख का संबंध महान मराठा सेनापति सदाशिव राव भाऊ (Sadashivrao Bhau) से है जिनका जन्म 4 अगस्त 1730 को हुआ था. भाऊ के नेतृत्व में ही मराठों ने पानीपत की तीसरी लड़ाई लड़ी थी... आइए जानते हैं पानीपत की तीसरी जंग का किस्सा

Third Battle of Panipat: इतिहास में पानीपत जंग (Panipat War History) की एक अहम जगह के तौर पर जानी जाती है. पानीपत में जितनी भी जंग हुई, इन सभी से भारत में बड़ा परिवर्तन आया. इन सबमें सबसे अहम है पानीपत का तीसरा युद्ध (Third Battle of Panipat)... भारत के सैन्य इतिहास में पानीपत के तीसरे युद्ध को अहम क्षण माना जाता है, जिसके बाद मराठा शासन (Maratha Empire in India) हमेशा के लिए महाराष्ट्र तक ही सीमित हो गया था. यह जंग 14 जनवरी 1761 को अफगान लुटेरे अहमद शाह अब्दाली (Ahmad Shah Abdali) की फौज और सदाशिव राव भाऊ के नेतृत्व में मराठों के बीच लड़ी गई थी. इस युद्ध में मराठों की शिकस्त हुई थी और अहमद शाह अब्दाली की जीत हुई थी. आज की तारीख का संबंध महान मराठा सेनापति सदाशिव राव भाऊ (Sadashivrao Bhau) से ही है जिनका जन्म 4 अगस्त 1730 को हुआ था.

एक गलती से पानीपत की जंग हारे मराठा

अफगानिस्तान के पश्तूनी इलाके में आम बोलचाल में ये कहा जाता है- तुम तो ऐसे दावे कर रहे हो, जैसे तुमने मराठों को शिकस्त दे दी है. इन इलाकों में कभी-कभी सवालिया तरीक़े से ये भी पूछा जाता है कि तुमने किस मराठा को हरा दिया है ? अब आप ये पूछ सकते हैं कि मराठों और पश्तूनों का भला ऐसा क्या कनेक्शन है? दरअसल, इस सवाल का जवाब पाने के लिए आपको चलना होगा 261 साल पहले.

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तब पानीपत की तीसरी जंग हुई थी और इस जंग में अफगानिस्तान में बाबा ए कौम के नाम से मशहूर अहमद शाह अब्दाली ने मराठा सेनापति सदाशिव राव भाऊ को शिकस्त दी थी. ये अब्दाली के जीवन की सबसे कठिन जंग थी क्योंकि उसका सामना उस बहादुर सदाशिव से था जिसने उसे करीब-करीब हरा ही दिया था. लेकिन मराठा सेनापति की एक छोटी सी इमोशनल गलती की वजह से पानीपत की तीसरी जंग में अब्दाली ने फतह हासिल कर ली. कई जानकार ये भी कहते हैं कि यदि सदाशिव ये जंग जीत लेते तो भारत का इतिहास कुछ और होता.

अब्दाली ने की थी मराठों की तारीफ

पानीपत की तीसरी लड़ाई में मिली जीत के बाद काबुल के शासक अहमद शाह अब्दाली (Ahmad Shah Abdali) ने अपने साथियों को खत लिखा. जनवरी 1761 में लिखे इस पत्र का मजमून कुछ इस तरह से था- मराठा फ़ौजियों ने ज़बरदस्त पराक्रम दिखाया. किसी दूसरी नस्ल के फ़ौजी ऐसी हिम्मत नहीं दिखा सकते. उन्होंने अपनी ज़िंदगी की आखिरी सांस तक लड़ाई लड़ी. वो अपनी मातृभूमि से दूर थे, उनके पास खाने की कमी थी लेकिन फिर भी उनके शौर्य में किसी तरह की कमी नहीं आई. अब्दाली ने ये कसीदे अपने उस दुश्मन की शान में गढ़े थे जिसका नाम था सदाशिव राव भाऊ (Sadashivrao Bhau).

सदाशिव राव भाऊ थे मराठों के सेनापति

दरअसल, पानीपत की हर जंग ने भारत के इतिहास को नया मोड़ दिया है. हम आज बात कर रहे हैं तीसरी जंग की. उस समय मुल्क में मुगलों का स्वर्णिम काल बीत चुका था और दिल्ली का तख़्त मराठों के भरोसे चल रहा था क्योंकि उनकी हिफाज़त का जिम्मा उन्हीं के कंधे पर था. ऐसे हालात में अफगानी सुल्तान अहमद शाह अब्दाली ने हिंदुस्तान पर हमला बोल दिया. पंजाब पर कब्ज़ा करने के बाद अब्दाली दिल्ली की ओर बढ़ चला. साल 1734 में मुगलों के साथ हुए रक्षा समझौते की वजह से मराठों को अब अब्दाली को रोकने के लिए आगे बढ़ना पड़ा. मराठों ने इसकी जिम्मेदारी अपने सबसे काबिल सेनापति सदाशिव राव भाऊ पर दी.

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बाजीराव के भतीजे थे सदाशिव राव भाऊ

आपने रणवीर सिंह की मशहूर फिल्म बाजीराव मस्तानी (Bajirao Mastani Movie) देखी होगी. सदाशिवराव भाऊ उन्हीं महान पेशवा बाजीराव (Peshwa Bajirao) के भाई चिम्माजी अप्पा (Chimaji Appa) के बेटे थे... मतलब बहादुरी उन्हें विरासत में मिली थी. उनके पिता चिम्माजी ने महाराष्ट्र का पूरा पश्चिम घाट पुर्तगालियों से छीन लिया था और मराठा साम्राज्य को कोंकण तक फैला दिया था. सदाशिव जब महज एक महीने के थे तभी उनकी मां का निधन हो गया था ऐसे में उनकी चाची काशीबाई ने उनका पालन-पोषण किया.

पानीपत की जंग में उतरने से पहले ही वे अपने रणकौशल का लोहा मनवा चुके थे. साल 1760 तक उन्होंने उत्तरी कर्नाटक के शहर कित्तूर, गोकक, बागलकोट, बादामी, बासवपटन और नवलगुंड का किला जीत लिया था. इसके बाद उदगीर की लड़ाई में उन्होंने हैदराबाद के निजाम को बुरी तरह हराया. हार के बाद निजाम ने अहमदनगर, दौलताबाद और बीजापुर उनको सरेंडर कर दिया. जब वे दक्कन में अपना झंडा गाड़ रहे थे तभी अहमद शाह अब्दाली के आने की खबर मराठों तक पहुंची.

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पानीपत की तीसरी लड़ाई: शुरुआत में मराठे थे आगे

मराठों ने अब्दाली को रोकने के लिए अपने असाधारण सेनानी सदाशिवराव भाऊ को भेजा. पानीपत में दोनों सेनाओं में एक घनघोर युद्ध शुरू हुआ. मराठा सेना संख्याबल में कम थी, लेकिन अपनी रणनीति की वजह से वो अफ़गान सेना पर भारी पड़ रही थी. दोपहर होते-होते अब्दाली की सेना घुटने टेकने लगी लेकिन तभी एक ऐसी घटना हुई जिसने पूरी लड़ाई का ही रुख बदल दिया. अब्दाली के सैनिकों की गोली सदाशिव के भतीजे और मराठों के अगले होने वाले पेशवा विश्वासराव (Peshwa Vishwasrao) को गोली लग गई.

विश्वासराव को गोली लगने के बाद बदले समीकरण

विश्वासराव को गोली लग गई. वो मैदान में गिर पड़े. भाऊ विश्वासराव से बहुत प्यार करते थे. जैसे ही उन्होंने उनको गिरते हुए देखा, मौके की नज़ाकत का ख़्याल उनके ज़हन से निकल गया. वो अपने हाथी से उतरे और एक घोड़े पर सवार हो कर दुश्मनों के बीच घुस गए. अंजाम की परवाह किए बगैर. उनके पीछे उनके हाथी पर हौदा ख़ाली नज़र आ रहा था. उसे ख़ाली देख कर मराठा सैनिकों में दहशत फ़ैल गई. उन्हें लगा कि उनका सेनापति युद्ध में मारा गया.

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अफरा-तफरी मच गई. मनोबल एकदम से पाताल छूने लगा. अफ़गान सेना ने इसका फ़ौरन फायदा उठाया. वो घबराई हुई मराठा सेना पर नए जोश से टूट पड़े. इसके बाद बेरहमी से मराठा सेना का क़त्लेआम हुआ. दूसरी तरफ सदाशिव अंतिम सांस तक लड़ते रहे. एक लंबे संघर्ष के बाद ही उनकी जान ली जा सकी. उनका बिना सिर वाला शरीर जंग के तीन दिन बाद लाशों के ढेर से बरामद हुआ. जिसका पूरे रीतिरिवाजों के साथ अंतिम-संस्कार किया गया. कहा जाता है कि अगले दिन उनका सिर भी बरामद किया गया. उसे एक अफ़गान सैनिक ने छुपाकर रखा हुआ था. उसका भी अंतिम-संस्कार हुआ और अस्थियां विसर्जन के लिए काशी ले जाई गई.

जंग के बाद खत्म हो गया पेशवाई दबदबा

इस युद्ध में हुई हार ने मराठा साम्राज्य को झकझोर कर रख दिया. पेशवाई का दबदबा खत्म हो गया. पानीपत के पहले जो मराठा साम्राज्य सफलता की उंचाइयां छू रहा था, वो एकदम से कमज़ोर, दीन-हीन हो गया. दूसरी तरफ अपने युवा पेशवा विश्वासराव और सेनापति सदाशिव राव की मौत का सदमा मराठी जनता के लिए बहुत भारी था. पूरा महाराष्ट्र हफ़्तों तक शोक मनाता रहा. कई जानकार ऐसा कहते हैं कि युद्ध में जीत के बावजूद अब्दाली तो वापस काबुल लौट गया लेकिन मराठों की हार ने भारत में अंग्रेजों के लिए रास्ते खोल दिए. पूरे किस्से का एक निष्कर्ष ये भी है कि लम्हों ने खता की सदियों ने सजा पाई... इस जंग के दूरगामी नतीजे निकले थे, जिनका असर हिंदुस्तान और अफगानिस्तान के साथ साथ कई और देशों पर भी पड़ा था.

चलते-चलते उन दूसरी बड़ी घटनाओं पर भी नजर डाल लेते हैं जो आज ही के दिन घटी थी.

1929: अभिनेता, गायक, निर्देशक किशोर कुमार (Kishore Kumar) का जन्म
1954: पाकिस्तान ने हाफिज जालंधरी (Hafeez Jalandhari) द्वारा लिखे गीत को राष्ट्रगान के रूप में अपनाया
1956: देश का पहला परमाणु अनुसंधान रिएक्टर अप्सरा (Nuclear Reactor Apsara) शुरू हुआ
1967: विश्व के सबसे लंबे चिनाई बांध नागार्जुनसागर (Nagarjuna Sagar Dam) का निर्माण

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अप नेक्स्ट

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