हाइलाइट्स

  • 1947 बंटवारे के बाद मीरपुर आए थे हिंदू-सिख
  • मीरपुर के राव रत्नसिंह ने नहीं निभाई जिम्मेदारी
  • 23-24 नवंबर 1947 को पाक सेना ने मीरपुर को घेर लिया

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The Mirpur massacre of November 1947: जब मीरपुर के हिंदुओं पर टूटी पाक फौजें! 25 नवंबर का किस्सा| Jharoka

The Mirpur massacre of November 1947 : भारत-पाक विभाजन के बाद मीरपुर में पाकिस्तानी सेना और कबाइलियों ने हिंसा और अत्याचार की सारी हदें पार कर दी थीं. आइए आज जानते हैं कि आखिर 1947 को मीरपुर में क्या हुआ था...

The Mirpur massacre of November 1947: 1947 में जब भारत पाक का विभाजन (India-Pak Partition) हुआ था और मुल्क आजाद हुए थे इसके दो महीने बाद ही पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ जंग छेड़ दी थी. पाकिस्तानी सेना और कबाइली कश्मीर में धावा बोल चुके थे.

इस पूरे ऑपरेशन में जहां घाटी में अत्याचार के सिलसिले को शुरू किया गया वहीं मीरपुर में भी जुल्म की पराकाष्टा को पार किया गया... आज हम इसी मीरपुर के किस्से को जानेंगे झरोखा में... आखिर 1947 में मीरपुर में हुआ क्या था?

1947 बंटवारे के बाद मीरपुर आए थे हिंदू-सिख

झेलम के पास बसा मीरपुर... ये शहर आज पीओके में है.. 25 नवंबर 1947 में आजादी से दो महीने बाद इस शहर पर जो विपदा आने वाली थी महीनो पहले शहरवासी उससे अनजान थे...

पाकिस्तान बना तो वहां से कई हिंदू और सिख इसी शहर में रहने चले आए थे... लेकिन आजादी के 2 महीने बाद यहां पर अत्याचार का जो सिलसिला शुरू हुआ उसने बंटवारे के वक्त हुई हिंसा को भी पीछे छोड़ दिया था..

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26 अक्टूबर 1947 को जब जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के संधिपत्र पर हस्ताक्षर (Jammu Kashmir Accedes to India) हुए थे. संधि पर हस्ताक्षर के बाद भारतीय सेना ने राजौरी, श्रीनगर में ऑपरेशन चलाया और वहां से दुश्मन सेना को खदेड़ दिया लेकिन सीमारेखा के पास बसे मीरपुर में तब तक पाकिस्तानी सेना और कबाइली ऐसे अत्याचार को अंजाम दे चुके थे जिसकी कोई सीमा नहीं थी.

किताब 'खोया हुआ कश्मीर : इतिहास के दर्पण में' में विजया गुप्ता ने उन सब बातों का जिक्र किया है जो मीरपुर पर त्रासदी बनकर टूट पड़ी थीं...

मीरपुर के राव रत्नसिंह ने नहीं निभाई जिम्मेदारी

मीरपुर के एक देशभक्त मुस्लिम फॉरेस्ट ऑफिसर ने वजीरे वजारत राव रत्नसिंह को वक्त रहते हर खबर दे दी थी. उसने बताया था कि पाकिस्तान के भेजे हमलावर किन किन रास्तों से शहर में घुसेंगे. मीरपुर में कौन कौन उनकी मदद करेगा. लेकिन राव रत्न सिंह ने इसपर भी अपने परिवार को तो जम्मू भेज दिया और वहां कोई ठोस कार्रवाई नहीं की.

नागरिकों की सुरक्षा में जुटे सैनिकों और अधिकारियों को लेकर वह मीरपुर से पलायन कर गया और शहर को एक तरह से दरिंदों के हवाले कर गया. आजादी के वक्त जम्मू-कश्मीर में जब पाकिस्तानी सेना और उनके सहयोगी कबाइलियों ने हमले किए, तभी उनके साथ असामाजिक तत्वों ने भी इकट्ठा होकर मीरपुर शहर को घेर लिया था. तब पाकिस्तान से खुद को बचाकर आए हिंदुओं ने यहां शरण ली हुई थी.

पाकिस्तान के पास पंजाब का जो क्षेत्र गया था, वहां से विस्थापित हिंदू सिख परिवार भी मीरपुर आ गए थे. हमले के वक्त पूर्व सूबेदार जगन्नाथ, चंद्रप्रकाश बजाज, अमृतलाल रत्ता, महाशय यशपाल, कृष्णलाल भगोत्रा, बख्शी विश्वनाथ, लोकनाथ, मलिक राम चौधरी की देखरेख में आम लोगों ने मोर्चे संभाल लिए.

स्थानीय नौजवान भी मैदान में डट गए थे. 25 नवंबर 1947 को सुबह 9 बजे मीरपुर में नागरिक सुरक्षा के प्रमुख एडवोकेट दीवान बद्रीनाथ, कुछ लोगों के साथ मीरपुर में तैनात डोगरा सेना की टुकड़ी के प्रभारी मेजर कार्की से मुलाकात की. मेजर कार्की से उन्होंने सैन्य मदद मांगी थी. तब कार्की ने कहा कि राव रत्नसिंह सैनिकों को लेकर छावनी से भाग निकले है, अब सहायता की बात करना भी फिजूल है.

अब कुछ बचे खुचे सैनिक, स्थानीय लोग और नौजवान ही मोर्चों पर तैनात हुए. दिन रात डर का साया मंडराने लगा था. अफवाहों और लाहौर के रेडियो पाकिस्तान के प्रसारण ने सुख चैन छीन लिया था. आजादी का महीना अगस्त और उसके बाद सितंबर तो ठीक बीता लेकिन अक्टूबर से ही विनाश के बवंडर उठने लगे थे.

23-24 नवंबर 1947 को पाक सेना ने मीरपुर को घेर लिया

23 और 24 नवंबर 1947 को शहर को चारों ओर से पाकिस्तानी कबाइलियों ने घेर लिया था. पाक सैनिक भी मार्टर ग्रेनेड, लाइट मशीनगन, राइफल व तोप से लेस होकर हमले करने लगी. शांतिप्रिय मीरपुर निवासियों के सिर पर मौत मंडराने लगी थी. सारी रात गोलीबारी होती रही.

आखिरकार 25 नवंबर 1947 को झेलम से सीधी सड़क का रास्ता साफ मिला और पाकिस्तानी फौजें तोप लाने में कामयाब हो गईं. शहर के दक्षिणी छोर पर स्थित पंजामूर्तियां और सिद्धों की ढेरी की पहाड़ियों पर इन तोपों को तैनात कर दिया गया. 25 नवंबर 1947 को मंगलवार को दिन था. उसी वक्त पाकिस्तानी सेना और कबाइलियों ने पश्चिमी हाथी दरवाजे को तोड़ दिया और उसपर लगा मोर्चा उखाड़ फेंका. अब शहर में पाक सेना के जवान खुलेआम घूम रहे थे.

शहर की रक्षा के लिए जो भी सैनिक थे, वे भाग खड़े हुए थे. मीरपुर के पास मौजूद जामा मस्जिद की मीनार पर पाक फौज के सिपाही बैठ गए और पूरे शहर को वहां से देखने लगे. शहर का सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस, एसपी याह्या खान था जिसे वहां के चप्पे चप्पे का पता था. इसी ने पाकिस्तान की पूरी मदद की. वह एक हफ्ते पहले ही पाकिस्तान गया था.

पाक सेना-कबाइलियों ने मीरपुर का हाथी दरवाजा तोड़ दिया

पाकिस्तानी फौज ने किसी घर को आग लगाई, किसी पर गोली, किसी को हथियारों से काटा. कई महिलाओं को हवस का शिकार बनाया गया. कईयों ने जहर खाकर अपनी जिंदगी को खत्म कर लिया, किसी ने फांसी लगा ली. शहर का हाथी दरवाजा तोड़कर जब फसादी आगे बढ़े तो लोग और महिलाएं कचहरी की ओर भागकर आईं. बलदेव राज नाम के शख्स को बुलाया गया लेकिन लड़ते हुए वह भी मारे गए.

मीरपुर शहर में एक रईस थे चंद्रप्रकाश बजाज. इस रोज चंद्रप्रकाश और उनके बड़े भाई लालचंद अकेले मोर्चे पर डटे रहे. बंदूक से कईयों को ढेर किया. शाम को उन्होंने आर्यसमाज मंदिर में लगभग 100 लोगों को सहमे देखा. उन्होंने हारकर युवतियों से आत्मबलिदान के लिए कहा. अपने दोस्त दौसा डाकू से मिली राइफल से इन्होंने कई पाक फौजियों को ढेर किया. इसी बीच भाई लालचंद की मृत्यु हो गई. उन्हें एक गोली आ लगी थी. जब राइफल में एक गोली बची तो चंद्रप्रकाश ने वह खुद पर मार ली और जान दे दी.

अलीपुर के गुरुद्वारे को जेल में बदल दिया गया

अलीपुर, मीरपुर से 8-10 किलोमीटर दूर अपर झेलम नहर मंगला हेडवर्क्स से निकली नहर के किनारे बसा छोटा सा कस्बा था. यहां पर एक भव्य गुरुद्वारा था. उस समय यह एक लाख रुपये की कीमत से बनवाया गया था. इसके वास्तुशिल्प की चर्चा दूर दूर तक होती थी. मीरपुर शहर में नरसंहार के बाद जो लोग बचे उन्हें कैद करके गुरुद्वारे में डाल दिया गया. इस गुरुद्वारे को जेल में बदल दिया गया. यहां बंद कैदियों से हर रोज हत्या, बलात्कार का खेल खेला जाता रहा.

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साढ़े 3 महीने बाद जब रेडक्रॉस सोसायटी के अधिकारी और प्रतिनिधि अलीबेग कैंप आए तब वहां के बचे खुचे शरणार्थियों की हालत देखकर सिहर उठे थे. बाद में इन्हें भारत लाया गया. 25 नवंबर 1947 को इस नगर पर काइलियों और पाक सेना ने भयंकर आक्रमण कर नरसंहार किया. इसी का जिक्र प्रो. बलराज मधोक ने किताब कश्मीर द स्टार्म सेंटर ऑफ द वर्ल्ड में किया है.

चलते चलते 25 नवंबर को हुई दूसरी घटनाओं पर भी एक नजर डाल लेते हैं

1866 : इलाहाबाद हाई कोर्ट (Allahabad High Court) बिल्डिंग का उद्घाटन हुआ.
1930 : जापान में एक ही दिन में भूकंप के 690 झटके रिकॉर्ड किए गए.
1965 : फ्रांस ने अपना पहला सैटलाइट लॉन्च किया.
1975 : सूरीनाम (Suriname) आज ही के दिन आजाद हुआ.
1982 : भारत की प्रसिद्ध महिला क्रिकेटर झूलन गोस्वामी (Jhulan Goswami) का जन्म हुआ.

अप नेक्स्ट

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