बेकाबू होते कोरोना संक्रमण के बीच देश के विभिन्न राज्यों से मेडिकल ऑक्सीजन की कमी (medical oxygen shortage) की शिकायतें आ रही हैं. इसकी कमी से दम तोड़ते मरीजों की लगातार आ रही तस्वीरें और खबरें दिल दहलाने वाली हैं. वैसे तो वातावरण में मौजूद ऑक्सीजन ही सांस लेने के लिए पर्याप्त है लेकिन कोरोना संक्रमण गंभीर होने पर फेफड़ों पर इसका गंभीर असर होता है, जिससे मरीज खुद से सांस नहीं ले पाता और उसे मेडिकल ऑक्सीजन सपोर्ट दिया जाता है. आइये समझते हैं कोरोना के समय में ये ऑक्सीजन इतनी महत्वपूर्ण क्यों है, और बताएंगे आपको इससे जुड़े कुछ अहम सवालों के जवाब.
कोरोना के मरीज़ को कब पड़ती है ऑक्सीजन की ज़रूरत?
कोरोना से पीड़ित हर मरीज को ऑक्सीजन सपोर्ट की ज़रूरत नहीं पड़ती है. सांस लेने में ज़्यादा तकलीफ होने पर ही ऑक्सीजन सपोर्ट की ज़रूरत पड़ती है. ये तब होता है जब मरीज़ के लंग्स में इंफेक्शन बढ़ जाता है और वो खुद से सांस लेने की हालत में नहीं होता.
कोरोना के मरीज़ को क्यों होने लगती है सांस लेने में दिक्कत?
कोविड-19 मरीज के रेस्पिरेटरी सिस्टम को प्रभावित करता है. लंग्स इंसान की सांस से ऑक्सीजन छांटकर उसे ब्लड वेसल्स तक पहुंचाते हैं, जहां से वह पूरे शरीर में फैलता है. रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट में रेस्पिरेटरी एपिथेलियल सेल्स होते हैं, जिसके ज़रिये लंग्स ऑक्सीजन अंदर और कार्बन कार्बन डाइऑक्साइड को बाहर करते हैं. कोरोना वायरस इन एपिथेलियल सेल्स को संक्रमित कर सकता है. इस इंफेक्शन से लड़ाई के दौरान शरीर का इम्यून सिस्टम भी सेल रिलीज करने लगता है, जिससे वेसल्स में सूजन पैदा होने लगती है. यह स्थिति ज्यादा देर तक रहने पर लंग्स तक ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती. साथ ही साथ उसमें फ्लूड भी जमा होने लगता है. ये दोनों परिस्थितियां मिलकर मरीज का सांस लेना मुश्किल कर देती हैं. इससे खून में ऑक्सीजन लेवल कम होना शुरू हो जाता है.
क्या भारत के कोरोना पेशेंट्स में सांस लेने में तकलीफ की शिकायत बढ़ रही है?
नेशनल क्लिनिकल रजिस्ट्री फॉर कोविड-19 का डेटा बताता है कि दूसरी लहर में सांस लेने में तकलीफ सिम्पटोमैटिक मरीजों में सबसे प्रमुख लक्षण है. अस्पताल में भर्ती 47.5 फीसदी मरीजों में इस बार यह समस्या देखी जा रही है, जो कि पिछले साल सिर्फ 41.7 फीसदी थी.
मेडिकल ऑक्सीजन क्या है ?
कानूनी रूप से ये एक आवश्यक दवा है जिसे 2015 में जारी की गयी मोस्ट इम्पोर्टेन्ट मेडिसिन्स की लिस्ट में शामिल किया गया था. इसे मेडिकल के तीन लेवल -प्राइमरी, सेकेंडरी और टर्शियरी के लिए ज़रूरी करार दिया गया है. ये WHO की ज़रूरी दवाओं की लिस्ट में भी शामिल है. प्रॉडक्ट लेबल पर मेडिकल ऑक्सीजन का मतलब 98 परसेंट तक शुद्ध ऑक्सीजन होता है