भगवान कृष्ण जैसा ही निराला है उनका जन्मोत्सव, हर क्षेत्र का है अलग रंग

Updated : Aug 11, 2020 10:25
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Editorji News Desk

जन्माष्टमी का पर्व हिन्दू मान्यताओं में एक बड़ा स्थान रखता है. बाल गोपाल के जन्म को लेकर देश में हमेशा उत्साह रहता है लेकिन इस बार कोरोना महामारी के चलते ये उत्साह कुछ फीका है. हालांकि बावजूद इसके मंदिर और लोग अपने अपने घरों में सजावट कर नंदलाल के स्वागत में जुटे हैं. आइए आपको बताते हैं के देश के अलग अलग हिस्सों में कैसी होती है जन्माष्टमी की छठा

पूरे उत्तर भारत विशेषकर वृंदावन और मथुरा में इसके जश्न और उत्साह की बात ही कुछ और होती है...हो भी क्यों ना...कृष्णा का जन्मस्थान जो ठहरा. इस अवसर पर मथुरा और वृंदावन का हर एक घर और मंदिर फूलों से सजा होता है और कृष्ण के जन्म और जिंदगी को बताती यहां 'बाल-गोपाल' की झांकियां निकाली जाती हैं. इस दौरान पूरी बृज भूमि श्याम के रंग में रंगी नजर आती है.

बात करें पूर्वांचल यानी बिहार और यूपी के कुछ हिस्सों की तो यहां श्रद्धालु इस दिन उपवास रखते हैं और आधी रात को व्रत खोलकर भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव मनाते हैं.

महाराष्ट्र में इस मौके पर दही हांडी के आयोजन के साथ गौ-अष्टमी मनाई जाती है. सड़कों पर गोविंदाओं की टोलियां नजर आती हैं जो एक ह्यूमन पिरामिड बनाकर ऊपर टंगी दही-मक्खन से भरी मटकियों को तोड़ती हैं. ऐसे ही आयोजन गुजरात में भी होते हैं और वहां भी कृष्ण जन्म को लेकर लोगों में खासा उत्साह रहता है.

दक्षिण भारत में, खासकर तमिलनाडु में जन्माष्टी को गोकुल अष्टमी के तौर पर मनाया जाता है. लोग चावल के आटे से फर्श पर कोलम बनाते हैं और अपने घरों में भगवन के कृष्ण के पैरों के निशान बना कर उन्हें अपने घर आमंत्रित करते हैं.

कृष्ण जन्माष्टमी के त्योहार की धूम देश के अलावा विदेशों में भी खूब देखने को मिलती है. इस अवसर पर दुनियाभर में फैले ISKCON मंदिरों में कृष्ण स्तुति की जाती है और गीत-भजन गा कर उनके जन्म का उत्सव मनाया जाता है. इतना ही नहीं मंदिरों में वासुदेव के महाभिषेक के बाद उन्हें 108 व्यजनों का भोग लगाया जाता है और बाद में इसे प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है.

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