दिल्ली हो ...
मुंबई हो ...
चेन्नई हो ...
या फिर कोलकाता...
देश के हर महानगर में पेट्रोल लगा चुका है सेंचुरी. जल रही है आम आदमी की जेब पर जनता को महंगाई की इस जलन से कोई निजात भी मिलती नहीं दिख रही. विपक्षी दल सड़क से संसद तक इसे उठा रहे हैं, हालांकि इसमें वो धार नहीं जो 2014 के समय बीजेपी के प्रदर्शनों में था, जब वो यूपीए सरकार में महंगे तेल पर सरकार को घेर रही थी. आज कच्चा तेल 2014 के मुकाबले बहुत सस्ता है लेकिन पेट्रोल और डीजल बहुत महंगा.
आइए आपको बताते हैं तेल का खेल, जानेंगे कि क्यों तेल 'सुपर हाई लेवल' पर बना हुआ है.
चलते हैं कुछ साल पीछे और बात करते हैं जुलाई 2011 की. उस दौरान क्रूड प्राइस यानी अंतर्राष्ट्रीय मार्केट में कच्चे तेल का दाम 113 डॉलर प्रति बैरल था, बावजूद इसके पेट्रोल का रीटेल भाव था 68 रुपए प्रति लीटर. अब बात करते हैं साल 2021 की. 19 जून को मुंबई में एक लीटर पेट्रोल के लिए दाम चुकाना पड़ रहा है करीब 108 रुपए जबकि कच्चा तेल सिर्फ 75 डॉलर प्रति बैरल है. तो क्या कारण है कि तेल का दाम वैश्विक बाजार में कम होने के बावजूद हमें इतना ज्यादा दाम चुकाना पड़ रहा है.
तेल का दाम 4 अहम चीजों पर निर्भर करता है, ये हैं ...
\\\ अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का दाम
\\\ एक्सचेंज रेट यानी डॉलर के मुकाबले रुपए की वैल्यू
\\\ एक्साइज ड्यूटी
\\\ राज्य सरकारों की तरफ से लगाया जाने वाला VAT
अब इन चारों बिंदुओं को एक एक कर समझते हैं-
पहला: कच्चे तेल की कीमत
अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम का सीधा असर भारतीय बाजार पर पड़ता है. आपको बता दें भारत में ब्रेंट क्रूड ऑयल आता है, जिसकी अभी कीमत है करीब 75 डॉलर प्रति बैरल. कुछ समय पहले कच्चे तेल की WTI कैटेगरी के तहत कच्चे तेल की कीमत नेगेटिव में चली गई थी यानी शून्य से नीचे तक पहुंच गई थी लेकिन इस कैटेगरी में न होने के कारण भारत को इस से कोई विशेष लाभ नहीं हुआ. ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत हाल फिलहाल में 21 अप्रैल 2020 को सबसे कम 19.90 डॉलर प्रति बैरल तक आ गई थी, लेकिन आम आदमी को उस बड़ी कमी का कोई लाभ नहीं मिला. जो फायदा हुआ वो सब सरकार के खाते में गया.
दूसरा: एक्सचेंज रेट
भारत अपनी मांग का करीब 80 फीसदी तेल आयात करता है, इसकी कीमत अमेरिकी डॉलर में चुकाई जाती है. लिहाजा रुपया बनाम डॉलर का एंगल भी अहम है. भारत सरकार ने एक समय पर कच्चे तेल की मौजूदा दर का भुगतान एक डॉलर के बदले 44 रुपये दर कर भी किया है लेकिन अब विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर के मुकाबले रुपया 74.73 के स्तर पर है, लिहाजा हमें रुपयों में अधिक भुगतान करना पड़ रहा है.
तीसरा: सरकार द्वारा वसूले जाने वाले टैक्स
कोरोना महामारी के चलते केंद्र और राज्य सरकारों का राजस्व काफी प्रभावित हुआ है. वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें कम होने के बावजूद पेट्रोल-डीजल पर टैक्स बढ़ा दिया गया. केंद्र सरकार ने अपना उत्पाद शुल्क बढ़ा दिया तो राज्यों ने भी ऐसा ही किया. जून में तय की गई दरों के मुताबिक पेट्रोल पर केंद्र सरकार का टैक्स 34 फीसदी से ज्यादा है जबकि राज्य 23 फीसदी से अधिक टैक्स वसूलते हैं. वहीं डीजल पर केंद्र सरकार 36 फीसदी से ज्यादा तो राज्य 14 फीसदी से अधिक टैक्स वसूलते हैं.
पेट्रोल पर केंद्र सरकार का टैक्स: 34.03%
पेट्रोल पर राज्य सरकार का टैक्स: 23.08%
डीजल पर केंद्र सरकार का टैक्स: 36.38%
डीजल पर राज्य सरकार का टैक्स: 14.63%
अब सवाल उठता है कि क्या आम आदमी को तेल के बढ़ते दाम से कभी राहत नहीं मिलेगी. इसका जवाब स्पष्ट रूप से तो दिया जाना मुश्किल है लेकिन तेल के दाम GST के दायरे में आ जाएं तो कुछ राहत मिल सकती है. ऐसा होने पर तेल पर लगने वाले टैक्स में एकरूपता आएगी और राज्यों की तरफ से लगाए जाने वाले अलग अलग VAT दर से छुटकारा मिल जाएगा.
अब अगला सवाल है कि पेट्रोल डीजल को GST के दायरे में लाया क्यों नहीं जा रहा? तो इसका जवाब है कि सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को कोई भला क्यों मारेगा. पेट्रोलियम पदार्थों से राज्यों को अच्छी खासी कमाई होती है. उदहारण के तौर पर महाराष्ट्र को इसके जरिए सालाना 25 हजार करोड़ रुपये से अधिक की कमाई होती है. वहीं वित्त राज्य मंत्री ने संसद को बताया है कि GST काउंसिल राजस्व को ध्यान में रखते हुए जब भी उचित समझेगी, पेट्रोल और डीजल को GST के दायरे में लाने पर विचार करेगी. हालांकि GST काउंसिल में पेट्रोल और डीजल को GST के दायरे में लाने के ऐसे किसी भी प्रस्ताव पर चर्चा नहीं की गई है.