Biryani: भूख लगी हो या ना लगी हो लेकिन बिरयानी की हांडी की महक नाक में पड़ते ही कदम अपने आप उस और चल पड़ते हैं और मन बस एक निवाला अपने मुंह में रखने के लिए उतावला हो उठता है. होता है या नहीं? बिरयानी के लिए हमारा प्यार कोई साधारण प्यार नहीं है. जितना मज़ेदार बिरयानी का स्वाद होता है उतना ही मज़ेदार इसका इतिहास (History of Biryani) भी है. हैदराबादी दम बिरयानी (Hyderabadi biryani) या लखनऊ की लखनवी बिरयानी से तो आप सब अच्छे से वाकिफ होंगे लेकिन आज हम आपको लेकर चलेंगे दिल और टेस्टबड्स को खुश कर देने वाली बिरयानी के ऐतिहासिक सफर पर, जहां हम इसकी हिस्ट्री के साथ इसकी अलग- अलग किस्मों के बारे में भी आपको बताएंगे.
इतने चाव से आप जिस बिरियानी को खाते हैं सबसे पहले ये तो जान लीजिये कि उसका नामकरण कैसे हुआ ? बिरयानी शब्द पर्शियन शब्द ‘बिरियन’ और ‘बिरिंज’ से बना है ‘बिरियन’ का मतलब है ‘कुकिंग से पहले फ्राई’ और ‘बिरिंज’ का मतलब है 'चावल'.
बिरयानी से जुड़ी कई सारी कहानियां मशहूर हैं. कुछ का मानना है कि लगभग सन 1398 के आसपास तर्क-मंगोल राजा तैमूर भारत में बिरयानी लाया था. एक और कहानी बिरयानी के इतिहास को, भारत के दक्षिणी मालाबार कोस्ट की ओर ले चलती है. ‘उन सोरू’ नाम से चावल और मांस के एक मसालेदार मिश्रण का जिक्र तमिल लिटरेचर में भी मिलता है. जो कहानी सबसे ज़्यादा प्रचलित है उसके अनुसार बिरयानी को भारत में लाने का श्रेय मुगल बादशाह शाहजहां की बेगम मुमताज महल को जाता है. जिन्होंने अपने बावर्चियों को कमज़ोर हो रहे सैनिकों के लिए कोई ऐसी डिश बनाने के लिए कहा जो उन्हें संतुलित आहार दे सके. उसके बाद चावल और मीट मिलाकर एक डिश तैयार की गई और इस तरह हुआ बिरयानी का जन्म. समय के साथ ये शाही मुगल रसोइयों में और भी बेहतरीन होती चली गयी.
अब चाहे आप किसी एक कहानी पर विश्वास करें या सारी मान लें. अलग अलग कहानियों का मतलब है कि अलग अलग तरीकों और टेक्निक से बिरयानी बनाई जाती रही हैं और ये आपको पूरे देश में भी दिख जाएगा. हैदराबादी बिरयानी हो या लखनवी बिरयानी या मुग़लई बिरयानी, सबके स्वाद और बनाने की टेक्निक में अंतर मिलेगा.
चलिए अब आपको बताते हैं कुछ अलग अलग तरह की बिरयानी के बारे में जो आपको ज़रूर ट्राई करनी चाहिए.
कलकत्ता बिरयानी (Kolkata Biryani)
इस के बारे में कहा जाता है कि जब अंग्रेज़ों ने नवाब वाजिद अली शाह की जमीन जब्त कर ली और वह 1856 में वहां से जाकर मेटियाब्रुज में रहने लगे. उन्हीं मुश्किल दिनों में पैसों की कमी होने की वजह से उनके बावर्ची ने बिरयानी में मीट की जगह आलू का इस्तेमाल करना शुरू किया. ये आलू ही तो आज कलकत्ता बिरयानी को अलग पहचान दिए हुए हैं. इसमें बहुत कम मसालों का इस्तेमाल किया जाता है और ये हल्का मीठापन लिए हुए होती है.
तहरी बिरयानी (Tahri Biryani)
बिरयानी वो भी मीट के बिना? जी हां तहरी बिरयानी बहुत सारी अलग अलग सब्ज़ियों से बनाई जाती है. दंतकथाओं के अनुसार तहरी बिरयानी का इज़ात मैसूर के मुग़ल शासक के दरबार में काम करने वाले उन लोगों के लिए किया गया था जो शाकाहारी थे .
थालास्सेरी बिरयानी (Thalassery Biryani)
थालास्सेरी बिरयानी चिकन विंग्स के साथ बनाई जाती है. इसमें हल्के मालाबार मसालों का तड़का इसे एक अलग एरोमा और स्वाद देता है. थालास्सेरी बिरयानी बनाने के लिए एक अलग तरह के चावल का इस्तेमाल किया जाता है जिन्हें कैमा चावल कहते हैं. इस बिरयानी में भुने हुए काजू, किशमिश और सौफ का इस्तेमाल करके फिनिशिंग टच दिया जाता है.
अम्बुर बिरयानी (Ambur Biryani)
आप जब भी तमिलनाडु जाएं तो अनोखे स्वाद वाली अंबुर बिरयानी की एक प्लेट ज़रूर खाएं. इसमें मीट को दही में मैरीनेट किया जाता है और फिर धनिया और पुदीने के फ्लेवर के साथ बनाया जाता है. उसके बाद मीट को अन्य मसालों के साथ पके हुए सीरगाी सांबा चावल में मिलाया जाता है. लीजिये हो गई साउथ इंडियन ट्विस्ट के साथ आपकी बिरयानी तैयार.
ये लिस्ट यहीं खत्म नहीं होती. हमारे देश में तो हर राज्य की अलग-अलग बिरयानी है. जैसे हैदराबादी बिरयानी, बॉम्बे बिरयानी, लखनवी बिरयानी, मुग़लई बिरयानी, कलकत्ता बिरयानी, सिंधी बिरयानी, कल्याणी बिरयानी, भटकली बिरयानी, कश्मीरी बिरयानी और डिंडीगुल बिरयानी.