जब सिनेमा नहीं हुआ करता था, तब लोगों के मनोरंजन का साधन रंगमंच हुआ करता था. आज के वक़्त में जब सिनेमा का क्रेज लोगों के बीच काफी तेज़ी से बड़ा है , एक तबका ऐसा है जिसके लिए रंगमंच पूज्यनीय है, जो रंगमंच में दिलचस्पी रखता है, क्योंकि इनका मानना है कि रंगमंच न सिर्फ मनोरंजन का साधन है बल्कि ये लोगों को सामाजिक और भावात्मक रूप से जगाने का भी साधन है. नाटक, चाहे वो मंच पर हो या किसी मोहल्ले के नुक्कड़ पर, दर्शकों के मन पर अपनी अलग छाप छोड़ता है. नाटक की इस विधा को जीवित रखने के लिए और सामाजिक मुद्दों पर जागरूकता फैलाने के लिए ही World Theatre Day मनाया जाता है.
भारत में रंगमंच का इतिहास बहुत पुराना माना है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि नाट्यकला का विकास सबसे पहले भारत में ही हुआ. ऋग्वेद के कतिपय सूत्रों में यम और यमी, पुरुरवा और उर्वशी आदि के कुछ संवाद हैं. इन संवादों को पढ़कर कई विद्वानों का कहना है कि नाटक की शुरुआत यहीं से हुई है. माना जाता है कि भरतमुनि ने नाट्यकला को शास्त्रीय रूप दिया है. अंतरराष्ट्रीय रंगमंच संस्थान द्वारा 1961 में इस दिन को मनाने की शुरुआत की गई. इस अवसर पर किसी एक देश के रंगकर्मी द्वारा World Theatre day के लिए आधिकारिक सन्देश जारी किया जाता है. जो लगभग 50 भाषाओं में ट्रांसलेट किया जाता है और वो दुनियाभर के समाचार-पत्रों में छपता है. 1962 में फ्रांस के जीन काक्टे पहला अंतरराष्ट्रीय सन्देश देने वाले कलाकार थे. कहा जाता है कि पहला नाटक एथेंस के एक्रोप्लिस में स्थित थिएटर ऑफ डायोनिसस में आयोजित हुआ था. इस दिन को मनाने का मुख्य उद्देश्य लोगों में रंगमंच को लेकर जागरुकता लाना और रंगमंच के महत्व को समझाना है.