कोरोना के रूप में देश के सामने एक गंभीर चुनौती है. मरीजों की संख्या नित नया रिकॉर्ड बना रही है और समय पर इलाज ना मिलने के कारण लोगों की जान जा रही है. मेडिकल स्टाफ और दवाइयों की कमी तो एक वजह है ही एक दूसरा कारण जिसकी आजकल काफी चर्चा है वो है देश में उचित मात्रा में ऑक्सीजन(Oxygen Crisis) की उपलब्धता का ना होना. इस संकट से उभरने के लिए कोशिशें शुरू कर दी गई हैं मसलन जिला स्तर पर अस्पतालों में 551 ऑक्सीजन प्लांट लगाए जाएंगे. इस काम को पूरा होने में 4 से 6 हफ्ते लगेंगे जबकि फिलहाल जरूरत फौरी राहत की है. जानकारों की मानें तो मौजूदा हालातों में ऑक्सीजन की सप्लाई और इसके लॉजिस्टिक सेट अप को ट्यून-अप करने की आवश्यकता है ताकि देश को सांस दिलाया जा सके. देश में बड़ी मात्रा में ऑक्सीजन का उत्पादन होता है और इसमें स्टील प्लांट्स की भी बड़ी भूमिका है.
वीओ: लेकिन क्या स्टील प्लांट्स के जरिए ऑक्सीजन संकट को दूर किया जा सकता है? जानकारों के मुताबिक अगर किसी स्टील प्लांट में 100 टन ऑक्सीजन का उत्पादन होता है तो इसमें से केवल 7 टन गैस का ही अस्पताल में इस्तेमाल हो सकता है. तो यानी अगर देश में एक लाख मीट्रिक टन गैस का उत्पादन होता है तो इसमें से 7500 मीट्रिक टन गैस का ही मेडिकल यूज हो पाएगा. इस महीने की 12 तारीख को सरकार ने कहा था कि मेडिकल इस्तेमाल के लिए जल्द ही 6600 मीट्रिक टन गैस मुहैया करवाई जाएगी. कुछ रोज पहले तक देश में 3,800 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की जरूरत होती थी लेकिन जैसे जैसे मरीज बढ़े अब ये मांग भी उछल कर 8 हजार मीट्रिक टन पर पहुंच गई है. ये जानकारी खुद केंद्र सरकार ने 18 अप्रैल के दिन हाई कोर्ट को दी है.
देश में बने इन हालातों को देखते हुए स्टील और गैस इंडस्ट्री ने कमर कस ली है और ऐसा नजर आ रहा है कि समस्या पर पार पा लिया जाएगा. 24 अप्रैल तक की स्थिति के मुताबिक रिलायंस के जामनगर प्लांट को 790 मीट्रिक टन, भिलाई स्थित SAIL प्लांट को 400 टन, बेल्लारी स्थित Linde प्लांट को 353 टन, तलोजा स्थित Linde प्लांट को 245 टन और बोकारो स्थित Inox प्लांट को 173 टन ऑक्ससीजन गैस का उत्पादन करना था. इसके अलावा कुछ और प्लांट्स भी उत्पादन में जुटे हैं और ये कुल उत्पादन 8200 मीट्रिक टन बैठता है.
अब इस गैस के इस्तेमाल की बात करें तो इसे महाराष्ट्र, गुजरात, यूपी, कर्नाटक और दिल्ली समेत दूसरे राज्यों में सप्लाई किया जाएगा. लेकिन इसमें पेंच कहां है... तो इसमें पेंच है लॉजिस्टिक और ट्रांसपोटेशन का. लिक्विड ऑक्सीजन की ढुलाई बहुत ही महंगे और खास टैंकरों में होती है और इसके रख रखाव में भी विशेष एहतियात बरतनी पड़ती हैं. मसलन दिल्ली को उसकी जरूरत की 490 टन गैस की सप्लाई हरियाणा के पानीपत स्थित Air Liquide प्लांट, भिवाड़ी स्थित Inox प्लांट, उत्तराखंड में स्थित India Gycols प्लांट और उत्तराखंड के ही सेलाकुई में स्थित Linde कंपनी के प्लांट से होती है. अब अगर यहां टैंकर उपलब्ध ना हो या देरी से उपलब्ध हो तो इस से समस्या में इजाफा होना तय है.
समस्या का दूसरा अहम पहलू है देश में मरीजों की संख्या का लगातार बढ़ना. ऑक्सीजन का लक्षित उत्पादन मौजूदा मरीजों की जरूरत पूरी कर सकता है लेकिन मामले इसी रफ़्तार से बढ़ते रहे तो ये ऑक्सीजन संकट को भी बढ़ाएंगे और उन हालातों में हमें इंपोर्ट समेत दूसरे विकल्पों को देखना पड़ेगा. आशा ये भी है कि तब तक कुछ अस्पताल अपनी भी व्यवस्था बना लेंगे. साथ ही मौजूदा हालातों में जरूरत इस बात की भी है कि अस्पतालों में ऑक्सीजन की मांग पर सटीक नजर बना कर रखी जाए और जहां जरूरत हो वहां के लिए बिना देरी के ढुलाई टैंकर उपलब्ध रहें.