भारत के प्रमुख त्योहार होली को गुरु गोविंद सिंह जी ने नए ढंग से मनाने की परंपरा आरंभ की थी. उन्होंने इस त्योहार को परमात्मा के प्रेम रंग में सराबोर कर अधिक आनंददायी स्वरूप दिया. श्री गुरुग्रंथ साहब में होली का उल्लेख करते हुए प्रभु के संग रंग खेलने की कल्पना की गई है. गुरुवाणी के अनुसार, परमात्मा के अनंत गुणों का गायन करते हुए प्रफुल्लता उत्पन्न होती है और मन महा आनंद से भर उठता है. जब मनुष्य होली को संतों की सेवा करते हुए मनाता है तो लाल रंग अधिक गहरा हो जाता है. होली के बाद छह दिन तक होला मोहल्ला का पर्व मनाया जाता है.
पंजाब के श्री आनंदपुर साहिब में होलगढ़ नामक स्थान पर गुरु गोबिंद सिंह जी ने होला मोहल्ला की रीति शुरू की. यहां आज किला होलगढ़ साहिब सुशोभित है. भाई काहन सिंह जी नाभा ने ‘गुरमत प्रभाकर’ में होला मोहल्ला के बारे में बताया है कि यह एक बनावटी हमला होता है, जिसमें पैदल और घुड़सवार शस्त्रधारी लोग दो दल बनाकर एक खास जगह पर हमला करते हैं.
वर्ष 1701 में गुरु गोबिंद सिंह जी ने सिंहों की दो दल बनाकर एक दल को सफेद वस्त्र पहना दिए और दूसरे को केसरी. फिर गुरु जी ने होलगढ़ पर एक गुट को काबिज करके दूसरे गुट को उन पर हमला करके यह जगह उनके कब्ज़े से मुक्त करवाने के लिए कहा. इस दौरान तीर या बंदूक आदि हथियार इस्तेमाल करने की मनाही की गई क्योंकि दोनों तरफ गुरु जी की फौजें ही थीं. आखिरकार केसरी वस्त्रों वाली सेना होलगढ़ पर कब्जा करने में सफल हो गई.
गुरु जी सिखों का यह बनावटी हमला देखकर बहुत खुश हुए और बड़े स्तर पर प्रसाद बनाकर सभी को खिलाया गया और खुशियां मनाई गईं. उस दिन से श्री आनंदपुर साहिब का होला मोहल्ला दुनिया भर में अपनी अलग पहचान रखता है. होला मोहल्ला का आरंभ प्रात: विशेष दीवान में गुरुवाणी के गायन से होता है. इसके पश्चात कवि दरबार लगता है जिसमें चुने हुए कवि अपनी कविताएं सुनाते हैं. दोपहर बाद शारीरिक अभ्यास, खेल और पराक्रम के आयोजन होते है और गुलाब के फूलों, गुलाब से बने रंगों की होली खेली जाती है